पटना हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में बांझपन को तलाक का वैध आधार मानने से इनकार कर दिया और क्रूरता के आधार पर दिए गए तलाक के फैसले को बरकरार रखा. कोर्ट ने कहा, ”बार-बार आरोप-प्रत्यारोप, सुलह की कोशिशों में नाकामी, लंबे समय तक अलगाव और आपराधिक मुकदमेबाजी जैसी परिस्थितियों के कारण शादीशुदा लोगों का रिश्ता पूरी तरह से टूट गया था.
ऐसी स्थिति में क्रूरता के आधार पर तलाक का निर्णय उचित है। पटना हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि महज संतानहीनता तलाक का आधार नहीं हो सकती. अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि दंपति को वर्षों तक आईवीएफ उपचार कराने के बावजूद बच्चा नहीं हो सका, तो केवल इस कारण से शादी को समाप्त नहीं किया जा सकता है।
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क्रूरता के आधार पर तलाक का फैसला बरकरार रखा गया
हालांकि कोर्ट ने ये भी माना कि मानसिक क्रूरता के कारण पति-पत्नी के बीच रिश्ता पूरी तरह से टूट गया है. इसलिए क्रूरता के आधार पर दिए गए तलाक के फैसले को बरकरार रखा गया. कोर्ट के मुताबिक, इस मामले में बच्चे का न होना नहीं, बल्कि मानसिक प्रताड़ना और वैवाहिक संबंधों का पूरी तरह टूटना तलाक का असली आधार था.
एक पत्नी की अपील पर जस्टिस चंद्र शेखर झा और बिबेक चौधरी ने सुनवाई की। महिला ने फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी. महिला ने आरोप लगाया कि उसके पति की क्रूरता और बिना उचित कारण के छोड़ देने के कारण उसकी शादी खत्म हो गई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने महिला के पति को 34 लाख 76 हजार रुपये का स्थायी भरण-पोषण भत्ता देने का आदेश दिया है. आपको बता दें कि महिला का पति सहायक अध्यापक है.
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने क्या कहा?
इस मामले की सुनवाई के दौरान 10 जुलाई को कोर्ट ने कहा था, ‘शादी सिर्फ इसलिए खत्म नहीं होती कि पति-पत्नी के बच्चे नहीं हुए और न ही तलाक सिर्फ इसलिए दिया जाता है कि वे लंबे समय से अलग रह रहे हैं।’
अदालत ने कहा, “यह निर्णय बरकरार रखा गया है क्योंकि साक्ष्यों के समग्र मूल्यांकन के आधार पर, वैवाहिक संबंध एक ऐसे स्तर पर पहुंच गया था जहां आपसी विश्वास पूरी तरह से टूट गया था, गंभीर आपराधिक मुकदमा शुरू हो गया था, सुलह के प्रयास बार-बार विफल हो रहे थे और समग्र आचरण मानसिक क्रूरता का गठन करता था।”
आपको बता दें कि इस जोड़े ने 12 जून 2010 को शादी की थी और बच्चा पैदा करने के लिए बार-बार आईवीएफ का सहारा लिया और लंबे समय तक इलाज कराया। शादी टूटने के बाद दोनों ने एक दूसरे पर आरोप लगाए. हाई कोर्ट ने कहा कि सालों तक बच्चा न होना ही इस विवाद की जड़ है. अदालत ने यह भी कहा कि महज बांझपन या बच्चा न होना किसी शादी को खत्म करने का कानूनी आधार नहीं है।
पति-पत्नी वर्षों तक बांझपन का इलाज कराते रहे
कोर्ट के फैसले के मुताबिक, बच्चा पैदा न कर पाने की वजह से पति-पत्नी दोनों ने सालों तक बांझपन का इलाज कराया और कई डॉक्टरों से सलाह ली. जिसमें आईवीएफ प्रक्रिया भी शामिल है। मेडिकल रिकॉर्ड से पता चला कि दोनों इलाज में सक्रिय रूप से भाग ले रहे थे और बच्चे के लिए लगातार प्रयास कर रहे थे।
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पति का कहना है कि उसने इसके लिए पैसे भी खर्च किए और डॉक्टरों से भी सलाह ली. पत्नी ने इसे स्वीकार कर लिया और बताया कि उसने इलाज में हिस्सा लिया है और पैसे भी खर्च किये हैं. कोर्ट ने इस फैसले में पति-पत्नी में से किसी को भी दोषी नहीं ठहराया है.
कोर्ट ने कहा, “विवाहित जीवन में लंबे समय तक बांझपन के भावनात्मक परिणामों को नजरअंदाज करना अवास्तविक होगा। मेडिकल रिकॉर्ड से साफ पता चलता है कि बच्चा न होने के कारण भावनात्मक तनाव के बावजूद दोनों ने शादी को बनाए रखने की कोशिश की।”
पत्नी ने दहेज और मारपीट का आरोप लगाया था
पत्नी ने उन पर साल 2018 में दहेज और हत्या के प्रयास, मारपीट और उत्पीड़न का आरोप लगाया था. उन्होंने अपने पति और उनके परिवार के खिलाफ मामला भी दर्ज कराया था. उसने यह भी आरोप लगाया था कि बच्चा नहीं होने के कारण उसके पति पर दूसरी शादी करने का दबाव डाला गया था. पति ने इन आरोपों को खारिज करते हुए झूठा बताया.
पीठ ने कहा कि जब वर्षों की कानूनी कार्यवाही के बाद भी गंभीर आपराधिक आरोप अप्रमाणित रहते हैं, तो यह आकलन करने में एक महत्वपूर्ण कारक बन जाता है कि क्या विवाह जारी रखना संभव है। पीठ ने आगे कहा, “बरी करने का मतलब केवल यह है कि अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे अपराध साबित करने में विफल रहा। इसका मतलब यह नहीं है कि शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए सभी आरोप जानबूझकर झूठे थे।”
कोर्ट ने कहा कि जब समग्रता में देखा जाए, तो लंबे समय से अलगाव, आपसी विश्वास का पूरी तरह से टूटना और सुलह के बार-बार असफल प्रयास, सबूत बताते हैं कि वैवाहिक संबंध बहुत पहले ही इस हद तक टूट चुके थे कि उन्हें सुधारना असंभव हो गया था।”
34 लाख रुपये भरण-पोषण भत्ता देने के निर्देश दिये गये
साथ ही कोर्ट ने पति से अलग रह रही पत्नी को हिंदू विवाह अधिनियम के तहत स्थायी गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया. कोर्ट ने संपत्ति और देनदारी के हलफनामे की जांच की, जिसमें पाया कि पति प्रति माह 86 हजार 9 सौ रुपये कमाता है. कोर्ट ने पति की सालाना आय को देखते हुए 34 लाख 76 हजार रुपये दो किश्तों में देने के निर्देश दिए हैं.
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पहली किस्त सूचना मिलने के 15 दिन के भीतर देनी होगी, जबकि दूसरी किस्त पहली किस्त के 60 दिन के भीतर देनी होगी. कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर पति यह गुजारा भत्ता देने में असमर्थ है तो पत्नी इसे वसूलने के लिए कानूनी कार्रवाई कर सकती है।
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