- रूस यूक्रेन के साथ शांति वार्ता के लिए सहमत हुआ।
- लावरोव ने कहा, मॉस्को बातचीत के लिए तैयार है.
- रूस ने डोनबास क्षेत्र पर कब्जे की अपनी मांग दोहराई.
- लावरोव ने ईयू को शांति के लिए खतरा बताया.
चार साल से ज्यादा समय से चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध के खत्म होने की दिशा में एक बार फिर उम्मीद की नई किरण नजर आई है। यूक्रेन की ओर से लगातार हो रहे हमलों के बीच रूस कीव के साथ शांति वार्ता करने पर सहमत हो गया है. रूस ने कहा है कि वह यूक्रेन के साथ शांति वार्ता के लिए तैयार है और मॉस्को उसी बिंदु से बातचीत फिर से शुरू करने के लिए तैयार है जहां ये वार्ता पहले रुकी थी.
कीव से बातचीत पर लावरोव ने क्या कहा?
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने मंगलवार (23 जून, 2026) को इस संबंध में एक बड़ी घोषणा करते हुए कहा कि रूस यूक्रेन के साथ उसी बिंदु से शांति वार्ता फिर से शुरू करने के लिए तैयार है, जहां वह पहले रुकी थी। पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘हम कीव के साथ बातचीत के लिए तैयार हैं, जैसा कि हम हमेशा से रहे हैं।’
इस दौरान उन्होंने साल 2022 में युद्ध शुरू होने के तुरंत बाद इस्तांबुल में हुई वार्ता और साल 2025 में दोबारा शुरू हुई वार्ता का भी जिक्र किया. हालांकि, लावरोव के बयान में मॉस्को की उस मांग में किसी बदलाव का संकेत नहीं मिला, जिसे कीव (यूक्रेन की राजधानी) पहले ही खारिज कर चुका है. दरअसल, रूस अब भी चाहता है कि यूक्रेन डोनबास क्षेत्र का बाकी हिस्सा छोड़ दे, जिसकी उसने अब तक रूसी सेनाओं के खिलाफ सफलतापूर्वक रक्षा की है।
यूरोप अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए ख़तरा बनता जा रहा है- लावरोव
रिपोर्ट के मुताबिक, रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव का यह बयान यूरोपीय संघ (ईयू) के नेताओं द्वारा गुरुवार (18 जून, 2026) को हुए शिखर सम्मेलन में किए गए दावों के बाद आया है, जिसमें यूरोपीय संघ के नेताओं ने कहा था कि रूस शांति वार्ता करने को लेकर बिल्कुल भी गंभीर नहीं है, वह बातचीत को आगे नहीं बढ़ाना चाहता है. रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने मंगलवार (23 जून, 2026) को कहा, ‘यूक्रेन को लगातार सैन्य सहायता देकर यूरोप अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बनता जा रहा है।’
गौरतलब है कि रूस और यूक्रेन के बीच अमेरिका की मध्यस्थता में आखिरी शांति वार्ता इसी साल फरवरी में हुई थी, लेकिन इसके बाद अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू कर दिया, जिससे अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक प्राथमिकताएं मध्य पूर्व की ओर मुड़ गईं.
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