अमेरिका और ईरान ने पश्चिम एशिया में संघर्ष को पूरी तरह खत्म करने के लिए शांति समझौते को लेकर एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन इस शांति समझौते को इजरायल और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए परेशानी का बड़ा कारण माना जा रहा है। दरअसल, दोनों पक्षों के बीच हुए इस शांति समझौते में न सिर्फ दोनों देशों के बीच दुश्मनी खत्म करने का प्रावधान शामिल है, बल्कि इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच युद्धविराम और लेबनान की क्षेत्रीय संप्रभुता और अखंडता के सम्मान की भी बात कही गई है।
वहीं, इस समझौते ने इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू के लिए एक कठिन राजनीतिक और रणनीतिक चुनौती पैदा कर दी है, क्योंकि हिजबुल्लाह के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जारी रखना इजरायल की नेतन्याहू सरकार की वर्तमान सुरक्षा नीति का केंद्र रहा है, जबकि दूसरी ओर, अमेरिका-ईरान समझौता नेतन्याहू की योजना के बिल्कुल विपरीत दिशा की ओर इशारा करता है।
इजरायली प्रशासन लेबनान छोड़ना नहीं चाहता
पीटीआई भाषा की रिपोर्ट के मुताबिक, शुक्रवार (19 जून, 2026) को इजराइल और हिजबुल्लाह के बीच एक और सीजफायर पर सहमति बनी थी, लेकिन अगले ही दिन इजराइल ने लेबनान पर बमबारी कर दी. इस हमले के जवाब में ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को एक बार फिर से बंद करने की घोषणा की, जिससे स्थिति और तनावपूर्ण हो गई.
दरअसल, मार्च 2026 से इजराइल ने हिजबुल्लाह के खिलाफ अपने सैन्य हमले बढ़ा दिए हैं और लेबनान के दक्षिणी और पूर्वी हिस्सों के कई इलाकों पर कब्जा कर लिया है। इस दौरान इजरायली रक्षा बल (आईडीएफ) ने हिजबुल्लाह के पारंपरिक गढ़ों को नष्ट करते हुए दक्षिण बेरूत में भी हमले किए हैं।
वहीं, आईडीएफ ने कई रणनीतिक इलाकों पर कब्जा कर लिया है और स्थानीय लोगों को वापस लौटने का आदेश जारी कर दिया है. इसके साथ ही इजरायली रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज ने यह भी कहा है कि इजरायली सेनाएं बिना किसी समय सीमा के सुरक्षा क्षेत्रों में तैनात रहेंगी और इन क्षेत्रों को आतंकवादी संरचनाओं और स्थानीय आबादी से मुक्त कराया जाएगा। इस सैन्य अभियान को इजराइल में व्यापक समर्थन प्राप्त है. इससे यह साफ हो गया है कि इजरायली प्रशासन लेबनान में अपनी पकड़ कमजोर नहीं करना चाहता है.
80 फीसदी इजरायली जनता लेबनान पर सैन्य कार्रवाई के पक्ष में
रिपोर्ट के मुताबिक, इजराइल में हुए एक हालिया सर्वे के मुताबिक करीब 80 फीसदी इजराइली नागरिक हिजबुल्लाह के खिलाफ युद्ध जारी रखने के पक्ष में हैं, भले ही इससे अमेरिका के साथ तनाव बढ़े. आगामी चुनावों को देखते हुए यह समर्थन प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
नेतन्याहू पर घरेलू आलोचना को कम करने के लिए अक्टूबर में होने वाले चुनावों से पहले सुरक्षा और निर्णायक जीत का संदेश देने का दबाव है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प आगामी मध्यावधि चुनावों से पहले मध्य पूर्व एशिया में एक लंबे युद्ध को समाप्त करके राजनीतिक लाभ हासिल करना चाहते हैं। इसके लिए वे ईरान के साथ समझौते को आगे बढ़ा रहे हैं और इजराइल से धैर्य की उम्मीद कर रहे हैं.
अमेरिका के साथ इजराइल के रिश्ते अहम
विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और इज़राइल के बीच संबंध असमान हैं, अमेरिका की आर्थिक और सैन्य सहायता इज़राइल के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। दोनों देशों के बीच हुए हालिया समझौते के तहत अमेरिका हर साल इजराइल को करीब 3.8 अरब डॉलर की मदद देता है, लेकिन मौजूदा हालात में लेबनान के हालात भी बेहद संवेदनशील बने हुए हैं. क्योंकि इजराइल में चुनावी माहौल गर्म है और अमेरिका-ईरान वार्ता इजराइल के हितों से अलग दिशा में बढ़ती दिख रही है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये है कि अब इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू की सियासी नैया किस करवट बैठेगी.
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