आज अगर भगत सिंह होते तो दंगों से कैसे निपटते, भारत में आजकल communal violence का ट्रेंड क्यों चल रहा है, Communal Violence Trends in India

Communal Violence Trends in India

Communal Violence Trends in India: पिछले दस दिनों से लगातार पूरे देशभर में कई जगहों से खबरें आ रही है religious rights की. धर्म के नाम पर हो रहे दंगों की, दिल्ली में जहांगीरपुरी, राजस्थान में करौली, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, कर्नाटक. लेकिन ये सब तो सिर्फ अभी के कुछ examples हैं. पिछले कुछ सालो से इस तरह का एक general trends कहीं ना कहीं पुरे देशभर में दिख रहा है.

देश में धर्म के नाम पर नफरत लोगों के बीच में बढ़ती जा ही रही है। minister of states for home affairs नित्यानंद राय ने parliament को बताया कि 2016 से लेकर 2022 तक का जो period था. इनमें 3400 के करीब दंगे देखने को मिले। धर्म के नाम पर communal/religious rights देखने को मिले। इन सब दंगों में कहीं ना कहीं एक pattern सा दिखने लगा है.

 

एक भीड़ अपने हाथ में हथियार और तलवारें लिए rally निकालेगी, उसमें से कुछ लोग गालियाँ देंगे दूसरे धर्म को, कुछ लोग वहाँ पर पत्थर फेंकेंगे, कुछ कहेंगे कि यहाँ पर outsiders को लाया गया है दंगे करवाने के लिए, कुछ politicians और धर्म के ठेकेदार भड़काऊ भाषण देंगे और फिर जब दंगे खत्म हो जाएंगे तो फिर कुछ heart warming कहानियां सामने आएंगी कि कैसे एक हिंदू इंसान ने अपने मुस्लिम neighbour को बचाया या एक मुस्लिम इंसान ने अपने हिंदू neighbour को बचाया।

Communal Violence Trends in India

सवाल यहाँ पर ये उठता है कि ये सब क्यों हो रहा है? मैं किसी एक specific दंगे की बात नहीं कर रहा, मैं यहाँ पर general trend की बात कर रहा हूँ. कौन responsible है इसके पीछे और क्या इसका कोई solution हो सकता है?

इन सवालों के जवाब दोस्तों मैं इस आर्टिकल में नहीं देनेवाला हूँ, क्योंकि इन सवालों के जवाब आज से सौ साल पहले दिए जा चुके हैं. किसी और के द्वारा नहीं बल्कि हमारे freedom fighter शहीद भगत सिंह के द्वारा।

जून 1928 में भगत सिंह ने कीर्ति मैगजीन में एक article लिखा था. “धर्म वर फसाद ते उंहा दा इलाज” यानि religious rights और उनका solution. भगत सिंह ने detail में analysis करी थी इसकी और आप हैरान हो जाएंगे जानकर की situation जो इंडिया में उस समय पर थी, आज भी कुछ वैसी ही चल रही है, ज्यादा बदली नहीं है. 

एक-एक पॉइंट जिसके बारे में भगत सिंह बात करते हैं वो आज के दिन तक valid है. आइए समझते हैं इस आर्टिकल में.

Bhagat Singh अपने इस article की शुरुआत करते हैं, ये कहते हुए की इंडिया की हालत बद से बदतर होती जा रही है. लोगों ने अपने पड़ोसियों को ही दुश्मन बना लिया है और वो भी उनका धर्म देखकर। वो अपने article में 4 direct reasons बताते हैं की ऐसा क्यों होने लग रहा है. 

पहला कुछ लोगों का communal mindset

भगत सिंह उदाहरण देते लिखते हैं, लाहौर में हुए दंगों का जहां पर हर धर्म के दंगे करने वालों ने हर धर्म के बेगुनाह लोगों को मारा था. जो मरने वाले लोग थे, वो हर धर्म से थे. लेकिन बेगुनाह थे और जो दंगे करने वाले थे वो भी हर धर्म से थे. उस आर्टिकल में वो कहते हैं कि ये दंगे करने वाले लोग अपनी तरफ से justification देते हैं कि ये rights क्यों करने लग रहे हैं. क्योंकि इनके धर्म के लोगों को मारा गया था, दूसरे धर्म के लोगों के द्वारा। ये तो सिर्फ अपने आप को बचाना चाह रहे हैं। भगत सिंह point out करते हैं कि इस बात में कोई logic नहीं है। दंगों में जो लोग मरते हैं वो कोई criminals नहीं होते। ना ही कोई भीड़ किसी एक इंसान को मारती है दंगों में क्योंकि उसने कुछ गलत काम किया था। दंगों में लोगों को मारा जाता है सिर्फ उनका धर्म देखकर।

एक हिंदू या मुस्लिम किसी दूसरे इंसान को मारता है सिर्फ ये देखकर कि वो मुस्लिम है या हिंदू है. उसे और किसी चीज से मतलब नहीं होता। भगत सिंह कहते हैं कि इन communal rights ने पूरे देश की इमेज खराब करके रख दी है, दुनिया के सामने और देश बर्बादी की कगार पर खड़ा है।

दूसरा कारण वो बताते हैं लोगों की heard mentality

कुछ लोग यहाँ पर डंडे, rods, तलवारें, चाकू उठा लेते हैं, अपनी dominance maintain करने के लिए। जब कोई हिंदू, मुस्लिम, या सिख अपने ही धर्म के इंसान को देखता है, हथियार उठाते हुए तो वो भी अपना दिमाग ठंडा नहीं रख पाता, बहाव में बह चलता है और भीड़ का हिस्सा बन जाता है। भगवती चरण बोहरा और भगत सिंह ने अपनी नौजवान भारत सभा के manifesto में इसी से ही related एक चीज को discuss किया था। उन्होंने इस चीज पर निराशा जताई थी कि कितना आसान है लोगों की feelings hurt करना धर्म के नाम पर. एक पीपल के पेड़ की डाली टूट जाती है तो एक हिंदू को दर्द होता है। ताजिया के कोने से एक टुकड़ा भी क्या टूट गया एक मुस्लिम को गुस्सा आ गया।

इंसानों की कम से कम जानवरों से तो ज्यादा थोड़ी importance होनी चाहिए ना. लेकिन अपने देश में लोग एक दूसरे इंसान का सर काटने तक रेडी हो जाते हैं sacred animals के नाम पर। इन्होंने अपने मैनिफेस्टो में बताया था कि कैसे religious superstition और biogtry हमारे progress में एक obstacle बनकर खड़ी है.

तीसरे नंबर पर भगत सिंह ने communal politicians को blame किया

इन्होंने कहा कि आज के दिन हालत ये हो गई है कि कुछ politicians openly communal बन चुके हैं. ऐसे-ऐसे भड़काऊ भाषण देते हैं जिसकी वजह से सीधे दंगे भड़कते हैं. हालाँकि उन्होंने ये भी कहा कि कुछ ऐसे politicians ज़रूर हैं जो इन चीजों को लेकर चिंतित हैं। लेकिन वो अपनी आवाज़ नहीं उठा पा रहे हैं. क्योंकि सांप्रदायिकता की सोच इतनी भारी पड़ती जा रही है देश पर, एक स्ट्रांग इनफ्लक्स हो रहा है communality का. तो शर्म के मारे उन्हें भी अपने सर झुका कर रखने पड़ रहे हैं और चुप रहना पड़ रहा है। 

 

चौथे नंबर पर भगत सिंह blame करते हैं, मीडिया को. कहते हैं journalism एक time पर respectable profession माना जाता था। लेकिन आज ये कीचड़ के सामान बन चुका है। अखबारों में front पेज पर बड़ी-बड़ी bold headlines लिखी आती हैं. जो लोगों के अंदर धर्म के नाम पर एक दूसरे के लिए नफरत फैलाती है। ऐसा कई बारी हुआ था कि अखबारों में कुछ लिखा गया था. जिसकी वजह से दंगे भड़के थे। आज के दिन यही काम टीवी मीडिया के द्वारा होता है। भगत सिंह अपने article में ये भी बताते हैं कि अखबारों की असली duty क्या है? लोगों को educate करना, लोगों के अंदर की नफरत को खत्म करना और धर्म के नाम पर लोगों के बीच में भाईचारा बढ़ाना। 

communal harmony और mutual trust की feelings  को जगाई जाए लोगों में ताकि एक common nationalism को promote किया जा सके। लेकिन अभी के अखबार इसका बिल्कुल उल्टा करने लग रहे हैं. जिसको लेकर भगत सिंह लिखते हैं कि उन्हें खून के आंसू आते हैं इस सबको होते देखकर। वो non-cooperation movement वाले दिनों को याद करते हैं, जब आजादी का सपना बहुत करीब था देश के। देश की आजादी आँखों के सामने दिखने लग रही थी. लेकिन आज के दिन आजादी अब एक दूर की ख्वाहिश बनकर रह गई है। दंगों की वजह से जो system है, जो bureaucracy है, उसने अपनी जड़ों को और मजबूत बना लिया है। यहाँ पर ये अंग्रेजों को refer कर रहे थे, ब्रिटिश राज को.

भगत सिंह आगे लिखते हैं कि ये जो कारण बताए गए ये तो direct reasons हैं communal rights होने के पीछे। लेकिन इन सब से भी बड़ा एक बुनियादी कारण है कि communal rights क्यों होने लग रहे हैं देश में? और ये कारण बताते हैं economic factors को. यहाँ पर ये कार्ल मार्क्स को भी साइट करते हैं। जो कहते हैं कि economic factors actually में सब चीजों के पीछे हैं, जो भी दुनिया में होती हैं। इतिहास में अक्सर देखा गया है कि जब लोग भूखे होते हैं, jobless होते हैं और frustrated होते हैं। इस frustration को या तो channelize किया जा सकता है, जिससे आगे जाकर एक revolution हो. जैसा की French revolution के टाइम पर हुआ था। जब भुखमरी के कारण हजारों औरतें सड़कों पर आ गई थी, अपने राजा-महाराजाओं के against protest करने। अगर इसे चैनलाइज नहीं किया जाएगा, इस frustration को तो देश में दंगे हो सकते हैं। लोग खुद में ही लड़ने लग जाएंगे। कम्युनल disharmony बढ़ेगी और इससे dictators का rise होगा।

सही सुना आपने जर्मनी में जब हिटलर का राइज हुआ था, उससे पहले एक economic depression देखने को मिली थी, भारी मात्रा में बैंक फेलियर, unemployment, economic instability थी. जिसकी वजह से लोग frustration में आकर एक ऐसे इंसान पर भरोसा कर बैठे जो देश को और भी तबाही की ओर ले गया और जिससे बाद में जाकर world war भी छिड़ गई। ये चीज मैंने आपको अपनी तरफ से बताई है जब भगत सिंह ने article लिखा था तब तक हिटलर का rise उस sense में देखने को नहीं मिला था अभी तक.

लेकिन भगत सिंह लिखते हैं कि इंडिया में जो economic situation है, वो बहुत बिगड़ चुकी है। और ये actually में बुनियादी रीजन है. जिसकी वजह से दंगे बढ़ रहे हैं, धर्म के नाम पर और क्योंकि communal rights के पीछे जो रीजन है वो economic है तो इसका solution भी economic ही होगा। यानि simply कहा जाए तो भगत सिंह कहते हैं लोगों की economic condition सुधारने की जरूरत है. लेकिन वे ये भी कहते हैं कि आज के circumstances में ये करना बहुत मुश्किल है क्यों? क्योंकि सरकार को कोई interest नहीं है economic conditions को सुधारने में. याद रखिए ये अपने समय की सरकार की बात कर रहे थे, ब्रिटिश इंडिया गवर्नमेंट की और exactly इसी reason से लोगों को एकजुट होकर सरकार के खिलाफ protest करने की जरूरत है। ताकि सरकार यहाँ पर एक्शन ले या फिर सरकार बदली जाए और इस foreign  सरकार को बाहर निकालकर फेंका जा सके।

लेकिन फिर यहाँ पर एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। लोग जब अपने आप से ही लड़ने में busy हैं तो कहाँ से सरकार के खिलाफ लड़ेंगे? उन्हें एक दूसरे से लड़ने से कैसे रोका जा सके? भगत सिंह कहते हैं कि solution है class consciousness. लोगों को जागरूक किया जाए. अब जो गरीब labourers हैं और जो किसान हैं उन्हें एहसास दिलाना पड़ेगा कि वो इन भड़काऊ नेताओं के और भड़काऊ धर्म के ठेकेदारों के भाषणों से प्रभावित ना हों और बेवकूफ ना बने। चाहे उनके race कुछ हो, उनका colour कुछ हो, उनका religion कुछ हो. चाहे वो किसी भी देश के क्यों ना हो। the poor of the world regardless of रेस,colour religion or nation have the same right.  उन्हें साथ इकट्ठे होकर सरकार से power छीननी पड़ेगी और अपने हक़ के लिए लड़ना पड़ेगा और इन गरीब लोगों के पास खोने के लिए वैसे भी कुछ है ही नहीं और पाने के लिए है सिर्फ अपनी आजादी?

यहाँ पर एक सवाल शायद आपके मन में उठे कि भगत सिंह अपने आर्टिकल में इतना गरीब लोगों पर फोकस क्यों कर रहे थे? हर किसी की बात क्यों नहीं कर रहे? सिर्फ poor workers और farmers के बारे में क्यों बात करने लग रहे हैं?

इसके पीछे रीजन बड़ा सिंपल है दोस्तों जो कि आज के दिन भी आपको देखने को मिलेगा। ये जितने भी communal riots हो रहे हैं, जितने भी दंगे होने लग रहे हैं, आज के दिन जहाँ पर भी हो रहे हैं? ऐसा तो है नहीं कि ये लुटियंस जोन में हो रहे हो. दिल्ली के जहांगीरपुरी, जो दिल्ली में एरिया है, बहुत ही गरीब एरिया है. आसपास काफी slums है इस एरिया में और पिछले कुछ दिनों में जहाँ-जहाँ भी ये दंगे देखने को मिले हैं. ज्यादातर वो जगहें हैं जहाँ पर गरीब लोग रहते हैं और ये गरीब लोग ही इन दंगों के victim बन रहे हैं। कभी आपने देखा है कि किसी भी religious दंगे में कोई हिंदू politician और एक कोई मुस्लिम politician खुद तलवार लेकर उतर जाए और ये politician ये नेता लोग एक दूसरे से तलवार लेकर fight कर रहे हो.  नहीं मिलेगा आपको देखने को।

politicians छोड़िए कभी आपने देखा है किसी दंगे में कि कोई हिंदू businessmen और मुस्लिम businessmen खुद उतर के आ गए हो और दंडे लेकर fight कर रहे हो, कभी आपको देखने को नहीं मिलेगा। कोई भी हिन्दू या मुस्लिम जो अपनी ढंग से job कर रहा हो। वो भी कभी दंगों में उतर के नहीं आएगा। वो अपनी job में busy होता है। ये unemployed, बेरोजगार, गरीब लोग होते हैं. जिनके पास अपनी कोई job नहीं है। अपना कोई business नहीं है mostly. क्योंकि भड़काऊ भाषण देने वाले जो नेता हैं. ये जो मीडिया वाले हैं. ये इनके खुद के बेटा-बेटी तो जाकर फॉरेन में मस्त हैं, पढ़ाई करने लग रहे हैं, अपने आराम से settled हैं, उन्हें किसी चीज की चिंता नहीं। और ये भी देख लेना कि कौन लोग मारे जाते हैं इन दंगों में, वो भी हमेशा एक lower economic सेक्शन के लोग होते हैं।

भगत सिंह अपने आर्टिकल में Russia का भी example लेते हैं. जहाँ पर एक tsar हुआ करता था। जब मोनार्की थी रसिया में. जब रशिया में लोगों की economic condition बहुत बेकार थी, इसकी वजह से कई riots और communal violence देखने को मिलता था रशिया में. for example रशियन empire में 1881 से लेकर 1884 तक और 1903 से लेकर 1906 तक लार्ज स्केल पर anti jewish violence देखने को मिला था। और काफी हद तक इस violence को सपोर्ट किया गया था उस समय की सरकार के द्वारा। जो कि Russian tsar की सरकार थी.

लेकिन भगत सिंह कहते हैं की जब से Russian revolution हुई, वोल्शेविक power में आए तब से situation सुधर चुकी है। economic condition लोगों की better हो गई है, लोगों के पास नौकरियां है. हर इंसान को इंसान की तरह देखा जाता है, उन्हें जूस या क्रिश्चियन या उनकी religious identities की तरह नहीं देखा जाता और क्योंकि लोग जागरूक हैं तो अब कोई religious rights नहीं देखने को मिलते रशिया में. वो अपने  समय की बात करने लग रहे हैं।

फिर एक similar positive example भगत सिंह इंडिया का भी देते हैं। कैलकटा का। कैलकटा में दंगे हुए थे हिंदू मुस्लिम को लेकर लेकिन उन हिंदू-मुस्लिम दंगों में trade union के members ने participate नहीं किया था। फैक्ट्री में काम करने वाले जो हिंदू और मुस्लिम थे वो अपना काम कर रहे थे। वो दंगों में participate नहीं कर रहे थे। वो खुश थे एक दूसरे के साथ काम करके।

ऐसा इसलिए हुआ, भगत सिंह के according क्योंकि उन trade union workers के अंदर class consciousness थी। वो साथ में एकजुट खड़े थे और अपने group के interest को समझते थे। उनकी राय में बहुत ही सुंदर example था कि class consciousness कैसे communal violence को होने से रोक सकती है.

finally अपने article के आखिर में भगत सिंह लिखते हैं कि कैसे इंडिया के youth से उन्हें बड़ी उम्मीद है कि इंडिया का youth communal और नफरत से दूर जा रहा है. काफी young लोग open है. अपने outlook में वो अपने आप को हिंदू, मुस्लिम, सिख की तरह नहीं देखते बल्कि अपने आप को इंसान की तरह देखते हैं. भगत सिंह लिखते हैं कि शायद इस youth में उन्हें उम्मीद दिखती है।

 

इसके अलावा वो कुछ नए politicians की भी तारीफ करते हैं जो politics में आए हैं और religion को politics से दूर रखते हैं, आजादी के लिए लड़ते हैं। यहाँ पर भगत सिंह ने उन politicians का नाम तो नहीं लिया। लेकिन most probably वो यहाँ पर जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस की बात कर रहे थे। ऐसा इसलिए क्योंकि अगले महीने वो इसी magazine में एक और आर्टिकल लिखते हैं, जिसका title होता है, नए नेताओं के अलग-अलग विचार और specifically वो point आउट करते हैं। जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस को उनकी तारीफ करते हुए। भगत सिंह के विचारों को.

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