बांकीपुर उपचुनाव में नामांकन के बाद बीजेपी ने क्यों बदला अपना उम्मीदवार? पढ़ें अंदर की कहानी

बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी तेज है. इस बीच बीजेपी के उम्मीदवार बदलने की भी चर्चा जोरों पर है. अभिषेक बंटी का नामांकन गुरुवार (09 जुलाई) को हुआ था और आज (10 जुलाई) उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया. इसके पीछे उन्होंने पारिवारिक कारणों का हवाला दिया है, लेकिन एक आम सोच वाला व्यक्ति भी कह सकता है कि ये असली वजह नहीं है. अब सवाल यह है कि उम्मीदवार बदलने के पीछे असली वजह क्या है?

क्या प्रशांत किशोर की वजह से बीजेपी ने बदला अपना फैसला?

क्या प्रशांत किशोर की वजह से बीजेपी ने बदला अपना फैसला? क्या बीजेपी ने मान लिया है कि बांकीपुर की लड़ाई मुश्किल हो गयी है? अगर लड़ाई कठिन है तो मजबूत महारथी देते. लेकिन पार्टी ने युवा मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष की जगह मंडल अध्यक्ष नीरज सिन्हा को टिकट दे दिया.

बांकीपुर में बीजेपी ने क्यों नहीं उतारा कोई हैवीवेट उम्मीदवार?

कहां उम्मीद थी कि अगर बीजेपी ने अभिषेक बंटी का टिकट काटा है तो नील रतन बोस या किसी दिग्गज को टिकट देगी ताकि मुकाबला बराबरी का रहे. लेकिन वैसा नहीं हुआ। बीजेपी ने किस प्रत्याशी को मैदान में उतारा है, इसकी जानकारी पार्टी के लोगों को भी नहीं है. बीजेपी को पत्रकारों के जरिए अपना प्रोफाइल शेयर करना होगा. खैर ये पार्टी का मामला है, पार्टी समझती है.

क्या अब नीरज पीके को टक्कर दे पाएंगे?

बांकीपुर अब सीधे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर मंडल अध्यक्ष तक राजनीतिक स्तर पर आ गया है. पार्टी सामान्य कार्यकर्ता का संदेश दे सकती है. लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि सामने वाला उम्मीदवार राष्ट्रीय स्तर की पहचान वाला है. बांकीपुर राजधानी पटना की शहरी सीट है. यहां के मतदाता शहरी सोच वाले हैं. वे ऐसा प्रतिनिधि चाहते हैं जो उस वर्ग का हो. लेकिन बीजेपी नेतृत्व ने ऐसा कोई फैसला नहीं लिया. शुरुआत में कई नाम सामने आए. लेकिन आख़िर में पहले बंटी और फिर नीरज का नाम.

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क्या बीजेपी ने की रणनीतिक गलती?

अब सवाल ये है कि क्या प्रशांत किशोर को वॉक ओवर मिलेगा? यह बात आप उम्मीदवार की लंबाई के हिसाब से मान सकते हैं. लेकिन फैसला तो मतदाताओं को करना है जो 30 जुलाई को करेंगे. जहां तक ​​समीकरण की बात है तो बीजेपी रणनीतिक भूल कर चुकी है. किसी भी दबाव में फैसला नहीं बदलना चाहिए था और हमने जो लिया था, उसे जारी रखा।’ अब इस बदलाव से अंदरूनी गुटबाजी बढ़ेगी. आपका वार्ड मेरे वार्ड की भावना पैदा कर सकता है।

प्रत्याशी बदलने से जा रहा है गलत संदेश!

बंटी भी कोई बहुत लोकप्रिय नाम नहीं था. लेकिन बीजेपी ने उन्हें मैदान में उतारकर यह संदेश जरूर दिया कि पार्टी अपने कार्यकर्ताओं का सम्मान करती है. वो माहौल बन गया था. नामांकन हुआ और फिर ये बदलाव. अब यह संदेश जरूर जाएगा कि बीजेपी अंदर से हिल गई है. नामांकन के बाद प्रत्याशी बदलने का यह मामला संभवत: भाजपा में पहला है। इसके पहले की कोई बात याद नहीं, खासकर बिहार की. लोकसभा के दौरान पवन सिंह को दिया गया टिकट वापस ले लिया गया. इस बार नामांकन मिलने के बाद इसमें बदलाव किया गया.

क्या बीजेपी दबाव में है?

कुछ लोगों का मानना ​​है कि बंटी चुनाव जीत गए होंगे लेकिन अब क्या होगा यह नहीं पता. यह भी कहा जा रहा है कि बीजेपी दबाव में है. एक तो नितिन नवीन की सीट का दबाव, दूसरा सम्राट चौधरी के नेतृत्व में पहला चुनाव. तीसरा, भरत तिवारी का मामला और कोर वोटरों की नाराजगी. आज पटना में बीजेपी समेत एनडीए के सभी दलों की बैठक हुई. संदेश एकजुटता का था लेकिन बीजेपी ने बीच मुकाबले में ही पहलवान बदल दिया.

बांकीपुर में 13 जुलाई तक नामांकन है. क्या पता बीजेपी फिर अपना उम्मीदवार बदल दे. फिलहाल इस बदलाव के चलते राजनीतिक गलियारों में बीजेपी का ग्राफ नीचे गिरता नजर आ रहा है. परसेप्शन की लड़ाई में प्रशांत को भारी फायदा हो रहा है.

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