पाकिस्तान की सिंध बार काउंसिल ने बलूच कार्यकर्ताओं को दी गई उम्रकैद की कड़ी आलोचना की है. बलूच यकजेहती कमेटी (बीवाईसी) के नेता मेहरांग बलूच को भी आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है। वकीलों ने कहा कि अगर यह फैसला निष्पक्षता, स्वतंत्र न्यायिक प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के बिना दिया गया है तो यह चिंता का विषय है. पाकिस्तानी आतंकवाद रोधी अदालत ने सोमवार (22 जून) को फ्रंटियर कोर अधिकारी की हत्या से जुड़े एक मामले में चार कार्यकर्ताओं को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
मेहरांग बलूच के साथ, बलूच छात्र संगठन (बीएसओ) के अध्यक्ष बलूच कादिर, केंद्रीय नेता अबू बकर कलांची और बीवाईसी नेता सिबगतुल्ला शाजी को भी आजीवन कारावास की सजा दी गई। बयान में सदस्यों ने कहा कि कानून की गरिमा उसके कठोर दंड में नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता में निहित है.
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न्याय पर सवाल
सदस्यों ने कहा कि अदालतों का उद्देश्य किसी भी प्रकार की सहमति थोपना नहीं है, बल्कि स्वतंत्रता की रक्षा करना, मनमानी को रोकना और मानवीय गरिमा की रक्षा करना है। यदि न्यायिक संस्थानों को स्वतंत्रता की रक्षा करने के बजाय असहमति को दबाने के साधन के रूप में देखा जाता है, तो यह संविधान की भावना को चोट पहुँचाता है और न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास को कमजोर करता है। बयान में आगे कहा गया, असहमति कोई अपराध नहीं है और शांतिपूर्वक नागरिक अधिकारों की मांग करना देशद्रोह नहीं माना जा सकता. किसी भी व्यक्ति को अपने अधिकार, न्याय और हाशिये पर पड़े लोगों की आवाज उठाने का अधिकार ही लोकतंत्र का मूल आधार है। सदस्यों ने यह भी कहा कि कोई भी समाज तब तक कानून के शासन का दावा नहीं कर सकता जब तक वह अपने विचार व्यक्त करने वालों को अपराधी मानता है।
असहमति बनाम शक्ति
सदस्यों ने बलूच कार्यकर्ताओं के खिलाफ की गई कार्रवाई को गलत बताते हुए कहा कि मानवाधिकार और संवैधानिक स्वतंत्रता के पक्ष में आवाज उठाने वालों को दंडित करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है. शासन की कमजोरी का जिक्र करते हुए आगे कहा गया कि जो लोग शांतिपूर्वक अपने अधिकारों की मांग करते हैं वे वास्तव में लोकतंत्र के सबसे मजबूत रक्षक हैं और उन्हें दंडित करना शासन की कमजोरी को दर्शाता है।
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