तुर्की की राजधानी अंकारा में मंगलवार (7 जुलाई) और बुधवार (8 जुलाई 2026) को नाटो देशों के नेताओं की अहम बैठक हो रही है. यह शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार नाटो सदस्य देशों पर रक्षा खर्च बढ़ाने के लिए दबाव बना रहे हैं. माना जा रहा है कि इस बैठक के दौरान कई यूरोपीय देश रक्षा क्षेत्र में अरबों डॉलर के नए समझौतों की घोषणा कर सकते हैं.
इस शिखर सम्मेलन में नाटो के सभी 32 सदस्य देशों के नेता हिस्सा ले रहे हैं. इसके अलावा यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की और दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे-म्युंग भी मौजूद हैं। ऑस्ट्रेलिया, जापान और न्यूजीलैंड ने अपने रक्षा या विदेश मंत्री भेजे हैं। बैठक में बहरीन, कुवैत, कतर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देशों के प्रतिनिधि भी भाग ले रहे हैं। हालाँकि सीरिया के राष्ट्रपति अहमद अल-शरा के शिखर सम्मेलन में भाग लेने की उम्मीद नहीं है, वह अंकारा में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के साथ एक अलग बैठक कर रहे हैं।
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नाटो को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का सवाल
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप लंबे समय से नाटो देशों के रक्षा खर्च पर सवाल उठाते रहे हैं. उनका कहना है कि अमेरिका पर सुरक्षा का भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है और अन्य देशों को भी अपनी जिम्मेदारी बढ़ानी चाहिए. ट्रंप के दबाव के बाद कई नाटो देशों ने पिछले कुछ सालों में अपने रक्षा बजट में बढ़ोतरी की है. पिछले साल नाटो देशों ने अपने रक्षा खर्च को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 5 फीसदी तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा था. इस साल की बैठक में इस बात पर चर्चा होगी कि बढ़े हुए बजट को वास्तविक सैन्य क्षमता में कैसे बदला जाए. हालाँकि, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि सिर्फ पैसा खर्च करने से तुरंत सैन्य ताकत नहीं बढ़ती है और इसके परिणाम सामने आने में कई साल लग सकते हैं।
नाटो बैठक में यूक्रेन अहम मुद्दा
इस शिखर सम्मेलन में यूक्रेन भी एक अहम मुद्दा बना हुआ है. यूक्रेन नाटो का सदस्य नहीं है, लेकिन रूस के साथ चल रहे युद्ध के कारण उसे नाटो देशों से समर्थन मिलता रहा है. इस दौरान राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ट्रंप से अलग से मुलाकात करेंगे. माना जा रहा है कि वे यूक्रेन के लिए अतिरिक्त पैट्रियट वायु रक्षा प्रणाली और अन्य सैन्य सहायता की मांग करेंगे। हाल ही में रूसी हमलों में यूक्रेन के कई शहर क्षतिग्रस्त हो गए हैं. कीव में ड्रोन हमले में कम से कम 11 लोग मारे गए. ऐसे में यूक्रेन चाहता है कि नाटो देश उसे राजनीतिक और सैन्य दोनों तरह से समर्थन देना जारी रखें ताकि उसकी रक्षा क्षमता कमजोर न हो. यूरोपीय देश भी इस शिखर सम्मेलन को काफी अहम मान रहे हैं. कई देश रक्षा क्षेत्र में बड़े निवेश और नए सैन्य अनुबंधों की घोषणा कर सकते हैं। कुछ विशेषज्ञ इसे ट्रंप प्रशासन को संतुष्ट करने की कोशिश के तौर पर भी देख रहे हैं.
तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन की भूमिका
इस बार शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहे तुर्की ने हाल के वर्षों में अपने रक्षा खर्च में लगातार वृद्धि की है और अब वह नाटो के प्रमुख सैन्य निर्यातकों में से एक है। इस बैठक में तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन की भूमिका भी अहम मानी जा रही है. इस बीच अमेरिका ने कुछ नाटो देशों से अपने लड़ाकू विमानों, युद्धपोतों और पनडुब्बियों की तैनाती धीरे-धीरे कम करने की योजना का संकेत दिया है। इससे यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस शिखर सम्मेलन का सबसे बड़ा उद्देश्य नाटो देशों के बीच एकता दिखाना है. भले ही सदस्य देशों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद हैं, लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध और बदलती वैश्विक स्थिति के बीच नाटो यह संदेश देना चाहता है कि उसका गठबंधन अभी भी मजबूत और एकजुट है।
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