पाकिस्तान सरकार पिछले 79 साल से एक ही सपना देख रही है, जम्मू-कश्मीर पर कब्जे का सपना. यही सपना आज पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर भी देख रहे हैं, लेकिन हालात ऐसे हो गए हैं कि अब जम्मू-कश्मीर तो छोड़िए, पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (पीओके) भी उनके हाथ से फिसलता नजर आ रहा है. पिछले 29 दिनों से पीओके की सड़कों पर हजारों लोग पाकिस्तान सरकार और सेना के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं.
महिलाओं से लेकर बुजुर्ग और बच्चे तक सभी पाकिस्तान की नीतियों के खिलाफ खुलकर सामने आ गए हैं. आंदोलनकारियों ने पाकिस्तान सरकार को आखिरी चेतावनी देते हुए 8 जुलाई तक की डेडलाइन दी है. सवाल ये है कि पीओके में ऐसा क्या हुआ कि लोग पाकिस्तान के खिलाफ आर-पार की जंग लड़ने को तैयार हो गए? पीओके में आए दिन पाकिस्तानी सेना के खिलाफ ‘ये आतंकवाद है…इसके पीछे वर्दी है’ जैसे नारों के साथ आवाजें उठ रही हैं.
क्या है प्रदर्शनकारियों का आरोप?
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सेना दमन, फायरिंग और गिरफ्तारियों के जरिए उनकी आवाज दबाने की कोशिश कर रही है. लेकिन इस बार स्थिति अलग है. रावलकोट से लेकर मुजफ्फराबाद, मीरपुर और ददियाल तक हजारों लोग सड़कों पर खड़े हैं. महिलाओं का कहना है कि वे अब पीछे हटने वाली नहीं हैं और चाहे उन्हें गोली खानी पड़े या जेल जाना पड़े, लेकिन वे अपना हक लेकर रहेंगी.
रावलकोट बस स्टैंड पर 11 जून से दस हजार से ज्यादा महिलाएं धरने पर बैठी हैं. उनके साथ छोटे बच्चे भी मौजूद हैं. आंदोलनकारियों का आरोप है कि 14 जून से पाकिस्तान सरकार ने खाद्य सामग्री, दवाओं और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बंद कर दी है. बॉर्डर पर दर्जनों ट्रक खड़े हैं, लेकिन उन्हें पीओके में घुसने नहीं दिया जा रहा है. इसके बावजूद प्रदर्शनकारी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं. उनका कहना है कि वे भूखे रहेंगे, लेकिन पाकिस्तान के सामने झुकेंगे नहीं.
प्रदर्शन के दौरान महिलाओं ने आसिम मुनीर की तुलना इस्लामिक इतिहास के सबसे विवादास्पद शासक यजीद से की और कहा कि अगर पाकिस्तान यजीद की तरह अत्याचार करेगा तो वे हुसैन की तरह लड़ेंगी. उनका कहना है कि चाहे उन्हें जेल में डाल दिया जाए या गोली मार दी जाए, लेकिन वे अपने हक की लड़ाई नहीं छोड़ेंगे. इन नारों और भाषणों से यह स्पष्ट हो गया है कि अब यह आंदोलन केवल आर्थिक मांगों तक ही सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पाकिस्तान शासन के खिलाफ व्यापक असंतोष में तब्दील हो गया है।
पाक सेना ने आंदोलन को रोकने के लिए अपनी ताकत का इस्तेमाल किया
इस आंदोलन को दबाने के लिए पाकिस्तानी सेना ने अपनी पूरी ताकत लगा दी है. घर-घर छापे मारे गए, सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया गया, नेताओं के खिलाफ आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत मामले दर्ज किए गए और इंटरनेट सेवाएं भी बंद कर दी गईं। लेकिन हर कार्रवाई के बाद आंदोलन मजबूत होता गया. आंदोलन का नेतृत्व कर रही ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) ने पाकिस्तान सरकार को स्पष्ट अल्टीमेटम दिया है कि अगर 8 जुलाई तक उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो आंदोलन और व्यापक हो जाएगा.
प्रदर्शनकारियों की कुल 38 मांगें हैं. इनमें गिरफ्तार नेताओं की रिहाई के साथ-साथ बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं और दर्ज मुकदमे वापस लेने की मांगें शामिल हैं। लेकिन सबसे बड़ा विवाद उन 12 विधानसभा सीटों को लेकर है जो जम्मू-कश्मीर के शरणार्थियों के नाम पर आरक्षित हैं. आंदोलनकारियों का आरोप है कि पाकिस्तान सरकार इन सीटों के जरिए अपने समर्थकों को असेंबली में भेजती है और पूरे पीओके की राजनीति को नियंत्रित करती है. यही वजह है कि सरकार किसी भी कीमत पर इस व्यवस्था को बदलना नहीं चाहती.
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प्रदर्शनकारियों ने सड़कें जाम कर दीं
4 जुलाई को ददियाल में प्रदर्शन के दौरान पाकिस्तानी रेंजर्स ने कथित तौर पर प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं. इस घटना में एक व्यक्ति की मौत हो गई जबकि कई लोग घायल हो गए. मुजफ्फराबाद में भी प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हुई, जिसमें कई लोग घायल हो गए. प्रदर्शनकारियों ने सड़कों को अवरुद्ध कर दिया और विरोध करने के लिए टायर जलाए, जबकि सुरक्षा बलों ने लाठीचार्ज का सहारा लिया।
आंदोलन से जुड़े आंकड़े भी पाकिस्तान के लिए चिंता का विषय हैं. अब तक 59 लोगों के मरने का दावा किया जा रहा है. 576 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. करीब 150 नेताओं के खिलाफ आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत मामले दर्ज किए गए हैं. 5 जून से इंटरनेट सेवाएं बंद हैं और कई इलाकों में खाने-पीने के सामान और दवाइयों की सप्लाई भी रोक दी गई है. इसके बावजूद प्रदर्शन जारी है.
आंदोलन के नेता सरदार अमन खान ने एक खुली बैठक में कहा कि अगर पाकिस्तान सरकार उनकी मांगें नहीं मानती है तो वे नियंत्रण रेखा (एलओसी) की ओर मार्च करेंगे. रावलकोट के ईदगाह मैदान में हजारों लोगों की मौजूदगी में उन्होंने कहा कि अब जनता तय करेगी कि आगे का रास्ता क्या होगा. इस बयान ने पाकिस्तान सरकार और सेना की चिंता और बढ़ा दी है.
लंदन में भी पाकिस्तान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन
पीओके का मुद्दा अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गूंजने लगा है. लंदन में पाकिस्तान उच्चायोग के बाहर हजारों लोगों ने मार्च निकाला और पाकिस्तान के खिलाफ प्रदर्शन किया. इसमें कश्मीरी प्रवासियों के साथ-साथ पश्तून और बलूच समुदाय के लोगों ने भी हिस्सा लिया. प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तान पर मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप लगाया और पीओके के लोगों के साथ एकजुटता दिखाई.
निगाहें 8 जुलाई की डेडलाइन पर टिकी हैं
अब सबकी नजरें 8 जुलाई की डेडलाइन पर टिकी हैं. अगर पाकिस्तान सरकार ने प्रदर्शनकारियों की मांगें नहीं मानीं तो पीओके में विरोध प्रदर्शन तेज हो सकता है. जो पाकिस्तान दशकों तक कश्मीर मुद्दे पर दुनिया के सामने भारत पर आरोप लगाता रहा, आज उसके कब्जे वाले कश्मीर में लोग खुलकर उसके खिलाफ आवाज उठा रहे हैं. यही वजह है कि पीओके का ये आंदोलन पाकिस्तान सरकार और असीम मुनीर के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक और सुरक्षा चुनौती बनता जा रहा है.






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