India US Trade Relations: अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। US Supreme Court ने अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा लगाए गए कुछ ‘रेसिप्रोकल टैरिफ’ को अवैध करार देते हुए निरस्त कर दिया है। इस फैसले का असर केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत सहित कई देशों के साथ उसके व्यापारिक संबंधों पर पड़ सकता है।
यह निर्णय वैश्विक व्यापार नीतियों के लिए एक निर्णायक मोड़ माना जा रहा है।
मुख्य बिंदु
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए कई टैरिफ को कानूनी आधारहीन बताया
भारत पर लगाए गए 10% अतिरिक्त टैरिफ पर भी प्रभाव
अनुमानित 175 बिलियन डॉलर की संभावित वापसी का मुद्दा
वैश्विक बाजारों में सकारात्मक संकेत
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता को मिल सकता है नया अवसर
टैरिफ की पृष्ठभूमि: विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
2025 की शुरुआत में राष्ट्रपति ट्रंप ने कई देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा की। उनका तर्क था कि कुछ देश अमेरिका के व्यापारिक हितों को नुकसान पहुँचा रहे हैं और असंतुलित व्यापार कर रहे हैं।
इन टैरिफ को लागू करने के लिए ट्रंप प्रशासन ने 1977 में बने अमेरिकी कानून International Emergency Economic Powers Act (IEEPA) का हवाला दिया। यह कानून राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपातकाल की स्थिति में आर्थिक प्रतिबंध लगाने की शक्ति देता है।
हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि:
“इस मामले में ऐसा कोई तात्कालिक राष्ट्रीय आपातकाल सिद्ध नहीं हुआ, जो IEEPA के तहत टैरिफ लगाने को उचित ठहराए।”
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: राष्ट्रपति की शक्तियों की सीमा तय
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय सर्वसम्मत बताया जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि IEEPA का उपयोग व्यापक व्यापारिक टैरिफ लगाने के लिए नहीं किया जा सकता, जब तक कि वास्तविक और प्रमाणित आपातकाल की स्थिति न हो।
इस फैसले के बाद:
संबंधित टैरिफ की वैधता समाप्त मानी जाएगी
प्रशासन को औपचारिक प्रक्रिया के तहत संशोधन या वापसी करनी होगी
अन्य देशों पर लगाए गए समान टैरिफ की भी समीक्षा संभव है
हालाँकि, स्टील और एल्युमीनियम पर लागू कुछ टैरिफ अलग कानूनी प्रावधानों के तहत जारी रह सकते हैं।
आर्थिक असर: बाजार और सरकारी वित्त पर प्रभाव
विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले से वैश्विक बाजारों में सकारात्मक संकेत मिल सकते हैं। व्यापारिक अनिश्चितता घटने से:
आयात-निर्यात लागत में स्थिरता आ सकती है
कंपनियों को दीर्घकालिक योजना बनाने में सुविधा मिलेगी
उपभोक्ताओं को संभावित रूप से बेहतर मूल्य मिल सकते हैं
इसके अलावा, मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यदि सरकार को पहले वसूले गए टैरिफ की वापसी करनी पड़ती है, तो यह राशि लगभग 175 बिलियन डॉलर तक हो सकती है। हालांकि, अंतिम निर्णय प्रशासनिक और न्यायिक प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगा।
भारत पर क्या प्रभाव?
भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंध रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं।
वर्तमान टैरिफ स्थिति
ट्रंप प्रशासन द्वारा भारत पर 10% अतिरिक्त टैरिफ लगाया गया था
इससे पहले कुछ उत्पादों पर लगभग 3.5% बेसिक टैरिफ लागू था
इस प्रकार कुल प्रभावी टैरिफ लगभग 13–14% के आसपास पहुँच गया था
पूर्व में उच्च दरों की चर्चा हुई थी, लेकिन वर्तमान कानूनी समीक्षा के बाद 10% अतिरिक्त टैरिफ पर विशेष ध्यान केंद्रित है।
भारत के लिए अवसर या चुनौती?
- नई व्यापार वार्ता की संभावना
यह फैसला भारत को अमेरिका के साथ अधिक संतुलित और दीर्घकालिक व्यापार समझौते पर बातचीत का अवसर दे सकता है।
- निर्यात सेक्टर को राहत
टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग और आईटी सेवाओं जैसे क्षेत्रों को संभावित राहत मिल सकती है।
- रणनीतिक संतुलन
भारत बहुपक्षीय व्यापार रणनीति अपनाकर अमेरिका, यूरोप और एशियाई देशों के साथ संतुलन बना सकता है।
विशेषज्ञ दृष्टिकोण
अंतरराष्ट्रीय व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला अमेरिकी संस्थागत ढांचे को मजबूत करता है। इससे संकेत मिलता है कि व्यापार नीति अब केवल कार्यपालिका के निर्णयों पर निर्भर नहीं रहेगी, बल्कि न्यायिक समीक्षा के दायरे में भी रहेगी।
यह वैश्विक निवेशकों के लिए एक सकारात्मक संकेत है कि अमेरिका में संस्थागत संतुलन कार्यरत है।
आगे क्या?
हालाँकि फैसला ऐतिहासिक है, लेकिन व्यापारिक समीकरण तुरंत सरल नहीं होंगे।
भविष्य की व्यापार नीतियाँ राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेंगी
गैर-टैरिफ बाधाएँ बढ़ सकती हैं
रणनीतिक क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा जारी रहेगी
भारत को अपनी निर्यात रणनीति को विविधतापूर्ण और लचीला बनाना होगा।
निष्कर्ष
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला वैश्विक व्यापार व्यवस्था में संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
भारत के लिए यह केवल टैरिफ का मुद्दा नहीं, बल्कि रणनीतिक अवसर भी है। आने वाले महीनों में भारत-अमेरिका व्यापार संबंध किस दिशा में जाते हैं, यह दोनों देशों की कूटनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा।














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