बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव अगले 25 दिनों तक बिहार ही नहीं बल्कि देश की राजनीति में भी बड़ा चर्चा का विषय रहने वाला है. भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद और सम्राट चौधरी के नेतृत्व में होने वाला यह पहला विधानसभा उपचुनाव है. यह सीट बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी, जिस पर अब उपचुनाव हो रहा है. हालांकि बीजेपी ने अभी तक उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है, लेकिन अब प्रशांत किशोर की वजह से यह चुनाव सुर्खियों में रहेगा.
सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस से बातचीत के बाद प्रशांत किशोर ने बांकीपुर से चुनाव लड़ने का फैसला किया है. अब सभी की निगाहें राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) पर है कि वह अपना उम्मीदवार उतारती है या पीके का समर्थन करती है. राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा जोरों पर है कि विपक्ष खासकर राजद और कांग्रेस पीके के पक्ष में रणनीति बना सकते हैं. अगर ऐसा हुआ तो मुकाबला बेहद दिलचस्प हो सकता है.
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तेज प्रताप यादव ने वीणा मानवी का गायन किया
यहां तेज प्रताप यादव ने वीणा मानवी को अपना उम्मीदवार बनाया है. वीणा मानवी महिलाओं के मुद्दों पर काम करती रही हैं. जन शक्ति जनता दल में शामिल होने से पहले उन्होंने राजद से टिकट मांगा था, लेकिन वहां से सकारात्मक संकेत नहीं मिलने के बाद उन्होंने दूसरी राह चुन ली. इससे पहले वह बीजेपी और जेडीयू से भी जुड़ी रही थीं. माना जा रहा है कि वह वैश्य समुदाय के वोटों के भरोसे मुकाबले में अपनी जगह बनाने की कोशिश करेंगी.
बांकीपुर विधानसभा सीट पटना जिले में आती है और लंबे समय से कायस्थ समुदाय का गढ़ मानी जाती रही है. यही वजह है कि बीजेपी एक बार फिर कायस्थ उम्मीदवारों को मैदान में उतारने की तैयारी में दिख रही है. फिलहाल पार्टी में कोई कायस्थ विधायक नहीं है, इसलिए इस समुदाय से उम्मीदवार तय माना जा रहा है.
नितिन नवीन और उनके पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा की लगातार जीत का एक बड़ा कारण यह जातीय समीकरण भी रहा है. 2006 में अपने पिता की मृत्यु के बाद नितिन नवीन विधायक बने और तब से लगातार चुनाव जीत रहे हैं. इससे पहले उनके पिता ने 1995 से 2006 तक इस सीट का प्रतिनिधित्व किया था.
बांकीपुर का राजनीतिक इतिहास भी खास है
इस सीट का इतिहास भी काफी दिलचस्प रहा है. पहले इसका नाम पटना पश्चिम विधानसभा था. कायस्थ समाज के बड़े नेताओं में केबी सहाय, महामाया प्रसाद और ठाकुर प्रसाद यहां से विधायक रहे. केबी सहाय और महामाया प्रसाद भी बाद में बिहार के मुख्यमंत्री बने.
1977 में रविशंकर प्रसाद के पिता ठाकुर प्रसाद जनता पार्टी के टिकट पर यहां से चुनाव जीते थे. लेकिन 1980 में बीजेपी के गठन के बाद हुए चुनाव में वह बीजेपी उम्मीदवार के तौर पर तीसरे स्थान पर रहे और कांग्रेस की जीत हुई.
इसके बाद 1985 और 1990 में निर्दलीय उम्मीदवार रामानंद यादव ने जीत हासिल की. फिर 1995 का चुनाव आया, जब पूरे बिहार में लालू यादव की लहर थी. उस चुनाव में भी रामानंद यादव जनता दल के टिकट पर हार गये और पहली बार बीजेपी ने यह सीट जीती. तब से यह सीट लगातार बीजेपी के पास है.
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कई बड़े चेहरों ने अपनी किस्मत आजमाई है
बांकीपुर सीट से कई मशहूर नेताओं ने भी चुनाव लड़ा, लेकिन जीत नहीं सके. इनमें रामकृपाल यादव, पुष्पम प्रिया चौधरी और शत्रुघ्न सिन्हा के बेटे लव सिन्हा जैसे नाम शामिल हैं. इससे साफ है कि यह सीट हमेशा हाई प्रोफाइल रही है, लेकिन यहां जीतना आसान नहीं रहा है.
यह पूर्णतः शहरी विधानसभा क्षेत्र है. यह सीट पटना नगर निगम के कुल 17 वार्डों के कुछ हिस्सों को मिलाकर बनाई गई है. इनमें से 5 वार्ड पूरी तरह से और 12 वार्ड आंशिक रूप से इस विधानसभा क्षेत्र में आते हैं. इस सीट के अंतर्गत महेंद्रू, राजेंद्र नगर, अशोक राजपथ, कदमकुआं, सैदपुर और गांधी मैदान का कुछ हिस्सा भी आता है. यहां के ज्यादातर मतदाता कारोबारी, नौकरीपेशा और शहरी मध्यम वर्ग के हैं.
पिछले चुनाव में बीजेपी का दबदबा था
पिछले 10 चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें तो लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों में बीजेपी को इस इलाके में 50 से 80 फीसदी तक वोट मिलते रहे हैं. विधानसभा चुनावों में पार्टी लगातार 50 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल कर रही है.
2025 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के नितिन नवीन को 98,299 वोट मिले थे, जबकि राजद की रेखा को 46,363 वोट मिले थे. जन सुराज ने भी अपना उम्मीदवार खड़ा किया था, लेकिन पार्टी तीसरे स्थान पर रही और उसे करीब 7,700 वोट ही मिल सके. यही वजह है कि बांकीपुर को बीजेपी का अभेद्य किला कहा जाता है.
जातीय समीकरण जीत-हार तय करेंगे
4 लाख से ज्यादा वोटरों वाली इस सीट पर कायस्थ वोटर करीब 15 फीसदी माने जाते हैं. इसके अलावा भूमिहार, ब्राह्मण और राजपूत समेत अन्य ऊंची जातियों की आबादी करीब 20 फीसदी है. वैश्य समुदाय की हिस्सेदारी भी करीब 15 फीसदी बताई जाती है. यह वर्ग लंबे समय से बीजेपी का मजबूत वोट बैंक रहा है.
वहीं, यादव मतदाता करीब 10 फीसदी हैं, जबकि मुस्लिम आबादी भी इसी के आसपास मानी जाती है. ऐसे में अगर प्रशांत किशोर की वजह से भूमिहार, ब्राह्मण और राजपूत वोटों में सेंध लगती है और यादव-मुस्लिम वोट एकमुश्त उनके पक्ष में चले जाते हैं तो बीजेपी के लिए मुकाबला मुश्किल हो सकता है. हालांकि, राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा होना आसान नहीं होगा.
बीजेपी से नील रतन घोष, अजय आलोक, ऋतुराज सिन्हा समेत कई नाम चर्चा में हैं. पार्टी ने चुनाव की तैयारियां तेज करते हुए 50 से ज्यादा विधायकों और संगठन के पदाधिकारियों को जिम्मेदारी दी है.
करीब 500 बूथों पर बूथ स्तर पर रणनीति बनाई जा रही है. माना जा रहा है कि चुनाव जीतने के लिए विधायकों, सांसदों, मंत्रियों और संगठन के पदाधिकारियों को बूथवार जिम्मेदारियां दी जाएंगी.
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13 जुलाई तक नामांकन, 30 जुलाई को मतदान
बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के लिए नामांकन की आखिरी तारीख 13 जुलाई है. 30 जुलाई को वोटिंग होगी, जबकि 3 अगस्त को काउंटिंग होगी. ऐसे में आने वाले दिनों में यह सीट बिहार की सबसे बड़ी सियासी लड़ाई का केंद्र बनी रहेगी.






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