1960 के दशक की एक शाम, चंडीगढ़ की सड़कों पर एक तांगा गुजर रहा था। तांगे में एक शख्स नशे में बेसुध पड़ा था, जिसे उसके दोस्त ने एक शराब के ठेके के बाहर से उठाया था। रास्ते में तांगे वाला गुनगुनाने लगा— “माए नी माए मैं एक शिकरा यार बनाया…”। यह वही गीत था जो उस समय पंजाब की फिजाओं में गूंजता था। तांगे वाले की आवाज सुनकर उस बेसुध शख्स के दोस्त ने पूछा, “तुम्हें पता है यह गीत किसका है?” तांगे वाले ने जवाब दिया, “यहाँ कौन है जो पंडित जी (शिव) को नहीं जानता?” विडंबना यह थी कि उस तांगे वाले को खबर ही नहीं थी कि जिसके गीत वह गा रहा है, वह ‘बिरहा का सुल्तान’ शिव कुमार बटालवी उसी के तांगे में बेसुध पड़ा है।
आज के दौर में जब दिलजीत दोसांझ फिल्म उड़ता पंजाब में ‘इइक कुड़ी’ गाते हैं या फिल्म चमकीला में ‘मैनू विदा करो’ बजता है, तो नई पीढ़ी को शिव कुमार बटालवी का परिचय मिलता है। लेकिन ‘पंजाब का जॉन कीट्स’ कहे जाने वाले शिव की असली कहानी उनके गीतों से भी ज्यादा दर्दनाक और गहरी थी।
पाकिस्तान से बटाला तक का सफर
शिव कुमार बटालवी का जन्म 23 जुलाई 1936 को ब्रिटिश राज के दौरान बारापिंड (अब पाकिस्तान) में हुआ था। 1947 के बंटवारे ने 11 साल की उम्र में शिव को उनके घर और जमीन से जुदा कर दिया और उनका परिवार भारत के बटाला में आ बसा। शायद विरह का पहला बीज यहीं उनके दिल में बो दिया गया था। पिता सरकारी पटवारी थे और चाहते थे कि बेटा भी कोई ‘ढंग की’ नौकरी करे, लेकिन शिव का मन नहरों के किनारे और पेड़ों की छांव में रमता था, जहां वह अपनी कविताओं की दुनिया बुनते थे।
इश्क, जो बना जानलेवा दर्द
शिव कुमार बटालवी की शायरी में जो दर्द है, वह महज कल्पना नहीं थी। उनकी जिंदगी में दो प्रमुख प्रेम प्रसंग आए जिन्होंने उन्हें हमेशा के लिए तोड़कर रख दिया।
1. मैना और मौत का गीत: बैजनाथ मेले में शिव की मुलाकात ‘मैना’ नाम की एक लड़की से हुई। दोनों में खामोश मोहब्बत पनपी। शिव ने फैसला किया कि वह मैना से अपने दिल की बात कहेंगे, लेकिन जिस दिन इजहार करना था, मैना वहां नहीं आई। शिव उसे ढूंढते हुए उसके गांव पहुंचे, तो पता चला कि मैना की मौत हो चुकी है। इस सदमे ने शिव को तोड़ दिया और इसी दर्द से उनका मशहूर गीत “इइक कुड़ी जीदा नाम मोहब्बत, गुम है…” का जन्म हुआ। शिव ने लिखा कि उस लड़की की सूरत परियों जैसी और सीरत मरियम जैसी थी।
2. अनुसूया और ‘शिकरा’ यार: बटाला में नौकरी के दौरान शिव को प्रसिद्ध लेखक गुरबख्श सिंह की बेटी अनुसूया से इश्क हुआ। लेकिन धर्म और आर्थिक हैसियत की दीवारें बीच में आ गईं। अनुसूया की शादी विदेश में हो गई। जब शिव को पता चला कि अनुसूया माँ बन गई है, तो उनके अंदर का दर्द फूट पड़ा और उन्होंने पंजाबी साहित्य का कालजयी गीत लिखा— “माए नी माए मैं एक शिकरा यार बनाया।” इस गीत में उन्होंने अपने प्रेमी की तुलना एक बाज (शिकरा) से की, जो उनके दिल का मांस खाकर उड़ गया और कभी लौटकर नहीं आया।
‘लूना’ और सबसे कम उम्र में साहित्य अकादमी पुरस्कार
शिव सिर्फ विरह के ही कवि नहीं थे, उन्होंने सामाजिक मान्यताओं को भी चुनौती दी। 1965 में प्रकाशित उनके महाकाव्य ‘लूना’ ने पंजाबी साहित्य की दिशा बदल दी। इसमें उन्होंने पौराणिक पात्र ‘लूना’ (जिसे सौतेले बेटे पूरन से प्रेम करने के कारण समाज ने खलनायिका बना दिया था) को एक मानवीय दृष्टिकोण दिया। शिव ने लूना की पीड़ा को एक नारी की व्यथा के रूप में पेश किया।
इस रचना के लिए 1967 में शिव को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। वह यह सम्मान पाने वाले सबसे कम उम्र के साहित्यकार बने।
“ज़िंदगी एक धीमी आत्महत्या है”
शिव कुमार बटालवी अक्सर कहते थे कि “दुख में भी फूल खिलते हैं” और “ज़िंदगी एक धीमी आत्महत्या है”। 37 साल की उम्र में ही वह दुनिया से जाने की बातें करने लगे थे। अपनी कविता में उन्होंने लिखा था, “असां तो जोबन रुत्ते मरना” (हमें तो भरी जवानी में मरना है, क्योंकि जवानी में मरने वाले या तो फूल बनते हैं या तारा)।
शराब की लत ने उनके जिगर को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया। उनके आखिरी दिनों में, जब इलाज बेअसर हो रहा था, तो उन्होंने अपनी पत्नी अरुणा (जिनसे उनकी शादी 1967 में हुई थी) से कहा कि वह अपनी मर्जी से मरना चाहते हैं, किसी दवा के सहारे नहीं।
आखिरी विदाई
लंदन यात्रा के दौरान शिव का एकमात्र इंटरव्यू बीबीसी के लिए रिकॉर्ड किया गया, जिसमें उनकी आवाज का दर्द साफ झलक रहा था। वहां भी कट्टरपंथियों ने उनकी आधुनिक सोच का विरोध किया। अंततः 1973 में, महज 37 साल की उम्र में, शिव कुमार बटालवी ने अपनी पत्नी के गांव में आखिरी सांस ली। उनकी मौत के बाद अखबार में उनकी वह तस्वीर छपी जिसमें वह लंदन में नशे में धुत पड़े थे, मानो दुनिया को उनके दर्द का आखिरी सबूत मिल गया हो।
अमृता प्रीतम ने ठीक ही कहा था कि शिव एक ऐसे पंजाबी कवि थे जो “फिनिक्स की तरह जले और अपनी ही आग में राख हो गए”। आज भी जब कोई “माए नी माए” गुनगुनाता है, तो लगता है कि बिरहा का सुल्तान कहीं किसी कोने में बैठा अपने आंसुओं से गीत लिख रहा है।
















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