Thalapathy Vijay politics: दक्षिण भारतीय सिनेमा के दिग्गज अभिनेता थलपति विजय अब अपने जीवन के सबसे अहम और चुनौतीपूर्ण किरदार में नजर आने वाले हैं। रुपहले पर्दे पर न्याय की लड़ाई लड़ने वाले थलपति विजय ने अब असल जिंदगी में तमिलनाडु की राजनीति का रुख कर लिया है, जिसका सीधा लक्ष्य 2026 के विधानसभा चुनाव हैं।
क्या सिनेमाई लोकप्रियता वोटों में तब्दील हो पाएगी, यह पूरे देश के लिए एक बड़ा राजनीतिक सवाल बन चुका है।
Thalapathy Vijay politics
• फरवरी 2024 में थलपति विजय ने अपनी राजनीतिक पार्टी ‘तमिझागा वेत्री कड़गम’ (TVK) का आधिकारिक ऐलान किया।
• उन्होंने अपनी 69वीं फिल्म के बाद सिनेमा जगत से पूरी तरह सन्यास लेने की घोषणा कर दी है ताकि वह अपना पूरा ध्यान 2026 के विधानसभा चुनावों पर लगा सकें।
• तमिलनाडु फतह करने के लिए उनकी पार्टी ने मशहूर चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर के साथ हाथ मिलाया है।
• विपक्षी और वैचारिक मोर्चे पर उन्होंने केंद्र की भाजपा और राज्य की सत्ताधारी द्रमुक (DMK) दोनों को अपना मुख्य प्रतिद्वंद्वी घोषित किया है।
• सेंसर बोर्ड में फंसी उनकी आगामी फिल्म ‘जननायकन’ को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने उनका समर्थन किया है, जिससे नए राजनीतिक समीकरणों के कयास लगाए जा रहे हैं।
सिनेमाई संघर्ष और आलोचनाओं से पार पाने का सफर
थलपति विजय का जन्म 22 जून 1974 को मद्रास (अब चेन्नई) में हुआ था। उनके पिता एस. चंद्रशेखर एक ईसाई और फिल्म निर्देशक थे, जबकि मां शोभा एक हिंदू और शास्त्रीय गायिका थीं। 1992 में जब उनकी पहली फिल्म ‘नालैया थिरपु’ रिलीज हुई, तब 18 वर्षीय विजय को दर्शकों और आलोचकों ने बुरी तरह नकार दिया था। उस दौर की मशहूर पत्रिकाओं ने उनके सांवले रंग और दुबले-पतले शरीर का खुलेआम मजाक उड़ाया था। लेकिन विजय ने हार नहीं मानी। पिता के समर्थन और अपनी मेहनत से उन्होंने खुद को पहले एक रोमांटिक हीरो और बाद में एक ‘मास एक्शन हीरो’ के रूप में स्थापित किया। ‘गिल्ली’ और ‘थुप्पाकी’ जैसी फिल्मों ने उन्हें तमिल सिनेमा के शिखर पर पहुंचा दिया।
सत्ता के साथ टकराव और राजनीतिक जमीन की तैयारी
थलपति विजय का व्यवस्था और सत्ता के साथ टकराव उनकी फिल्मों और असल जिंदगी, दोनों में नजर आने लगा था। 2013 में जब उनकी फिल्म ‘थलाइवा’ आई, जिसकी टैगलाइन “टाइम टू लीड” (नेतृत्व करने का समय) थी, तो तत्कालीन जयललिता सरकार ने इसे एक चुनौती माना और फिल्म की रिलीज रोक दी गई। 2014 में ‘कत्थी’ के जरिए उन्होंने कॉर्पोरेट लूट का मुद्दा उठाया।
सत्ता से उनका सबसे बड़ा टकराव 2017 में फिल्म ‘मेर्सल’ के दौरान हुआ, जिसमें उन्होंने जीएसटी (GST) और नोटबंदी की तीखी आलोचना की थी। इसके बाद भाजपा नेताओं ने उन पर निशाना साधा और उनके धर्म को लेकर भी विवाद खड़ा करने की कोशिश की। 2018 में फिल्म ‘सरकार’ में राज्य सरकार द्वारा मुफ्त बांटे जाने वाले सामान (फ्रीबीज) पर सवाल उठाने के कारण अन्नाद्रमुक (AIADMK) के कार्यकर्ताओं ने कड़ा विरोध किया। फरवरी 2020 में आयकर विभाग ने फिल्म के सेट पर छापेमारी की और उन्हें पूछताछ के लिए ले जाया गया, लेकिन अगले ही दिन विजय ने प्रशंसकों की भारी भीड़ के साथ एक सेल्फी लेकर अपने विरोधियों को अपनी ताकत का सीधा संदेश दिया।
तमिझागा वेत्री कड़गम (TVK) का उदय और 2026 का लक्ष्य
लंबे समय तक चले कयासों को विराम देते हुए 2 फरवरी 2024 को थलपति विजय ने अपनी राजनीतिक पार्टी ‘तमिझागा वेत्री कड़गम’ (TVK) की स्थापना की। उन्होंने अक्टूबर 2024 में एक विशाल रैली को संबोधित करते हुए अपनी विचारधारा को स्पष्ट किया, जो धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय पर आधारित है। विजय ने पेरियार, कामराज और डॉ. बी.आर. अंबेडकर को अपना वैचारिक आदर्श मानते हुए दलित, द्रविड़ और राष्ट्रवादी वोट बैंक को साधने की मजबूत रणनीति पेश की है।
अपनी गंभीरता साबित करने के लिए उन्होंने यह साहसिक कदम भी उठाया कि वह राजनीति के लिए अपने सफल फिल्मी करियर को हमेशा के लिए छोड़ देंगे।
प्रशांत किशोर के साथ गठजोड़ और राहुल गांधी का समर्थन
2026 के विधानसभा चुनावों में जीत सुनिश्चित करने के लिए थलपति विजय की पार्टी ने दिग्गज चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को अपने साथ जोड़ा है। प्रशांत किशोर 2021 में द्रमुक (DMK) को जीत दिला चुके हैं और अब वह विजय की पार्टी के लिए रणनीति तैयार कर रहे हैं। दूसरी तरफ, विजय की आने वाली फिल्म ‘जननायकन’ सेंसर बोर्ड में अटक गई है। इस विवाद पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना करते हुए इसे तमिल संस्कृति पर हमला बताया। इस बयान को केवल एक फिल्म के समर्थन से अधिक एक संभावित राजनीतिक गठजोड़ के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
विश्लेषण (Analysis)
तमिलनाडु का राजनीतिक इतिहास सिनेमाई सितारों के राजनीति में आने और सफल होने के उदाहरणों से भरा पड़ा है। एम.जी. रामचंद्रन (MGR) और जे. जयललिता ने जो अपार राजनीतिक सफलता हासिल की, वह थलपति विजय के लिए एक प्रेरणा है। विजय वर्तमान में द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच मौजूद तीसरे विकल्प की कमी को पूरा कर सकते हैं। हालांकि, राजनीति का यह सफर आसान नहीं है। इतिहास में शिवाजी गणेशन और चिरंजीवी जैसे बड़े सुपरस्टार्स का उदाहरण भी मौजूद है, जिनकी रैलियों में भीड़ तो बहुत आई, लेकिन वह भीड़ वोटों में नहीं बदल सकी। कमल हासन और रजनीकांत भी चुनावी राजनीति में वह बड़ा प्रभाव नहीं छोड़ पाए जिसकी उम्मीद थी।
विजय की सबसे बड़ी चुनौती अपने करोड़ों प्रशंसकों की निष्ठा को एक ठोस राजनीतिक वोट बैंक में परिवर्तित करना और राज्य के जटिल जातिगत और वैचारिक समीकरणों को साधना होगा। हाल ही में उनकी एक रैली में हुई भगदड़, जिसमें 41 लोगों की जान चली गई, यह भी दर्शाती है कि प्रशासनिक अनुभवहीनता उनके लिए एक बड़ा मुद्दा बन सकती है।
निष्कर्ष (Conclusion)
थलपति विजय का सिनेमा के पर्दे से निकलकर तमिलनाडु की सक्रिय राजनीति में कदम रखना राज्य के राजनीतिक परिदृश्य में एक भूचाल लाने की क्षमता रखता है। उनके कड़े फैसले, प्रशांत किशोर जैसी टीम का साथ और जनता के बीच उनकी जमीनी पकड़ उन्हें एक मजबूत दावेदार बनाती है। 2026 के विधानसभा चुनावों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या थलपति विजय अपनी ‘मास अपील’ के दम पर तमिलनाडु की सत्ता के शीर्ष पर काबिज होकर मुख्यमंत्री पद तक पहुंच पाते हैं या नहीं। उनकी राजनीतिक यात्रा केवल एक सुपरस्टार की कहानी नहीं, बल्कि दक्षिण भारत की बदलती राजनीतिक व्यवस्था का एक नया अध्याय है।
















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