News4Life

Life Changing News & Views

“संजय, मुझे तुम्हारी नसीहत नहीं चाहिए”: पिता के वो आखिरी शब्द, जो आज भी संजय मिश्रा को अंदर तक तोड़ देते हैं

“ढोंढू जस्ट चिल” कहने वाले संजय मिश्रा (Sanjay Mishra) को आपने अक्सर हंसाते हुए देखा होगा। उनकी कॉमेडी में एक अलग ही देसीपन है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस हंसी के पीछे एक गहरा दर्द छिपा है? हाल ही में शुभांकर मिश्रा के पॉडकास्ट में ‘आंखों देखी’ के बाऊजी ने अपनी जिंदगी के कुछ ऐसे पन्ने खोले, जिसे सुनकर आप अपनी हंसी रोक नहीं पाएंगे, तो अगले ही पल आपकी आंखें नम हो जाएंगी।

पिता की मौत का मलाल, मां को खोने का डर और शमशान की राख लपेटकर ससुराल पहुंचने का अजीबोगरीब किस्सा—पढ़िए संजय मिश्रा की ‘अनप्लग्ड’ कहानी।

पिता की वो डायरी और आखिरी ‘नसीहत’

संजय मिश्रा अपने पिता के बेहद करीब थे, लेकिन एक कसक आज भी उनके दिल में बाकी है। इंटरव्यू में भावुक होते हुए संजय ने बताया कि उनके पिता का उनसे बोला गया **आखिरी संवाद** किसी फिल्म का डायलॉग नहीं, बल्कि एक कड़वी हकीकत थी। उनके पिता ने कहा था, **”संजय, मुझे तुम्हारी नसीहत की जरूरत नहीं है”**,।

संजय बताते हैं कि उनके पिता की एक डायरी थी, जिसमें उन्होंने लिखा था कि संजय ने उन्हें ‘डिप्रेस’ (उदास) कर दिया है। यह बात संजय को तब पता चली जब उनके पिता का शव घर में पड़ा था। उस वक्त संजय को लगा कि काश वो उस लम्हे को बदल पाते। यह अपराधबोध (Guilt) उन्हें आज भी कचोटता है कि उनके पिता शायद उनसे खुश नहीं थे,,।

“मां के मरने से पहले मैं मरना चाहता हूं”

मृत्यु को लेकर संजय मिश्रा का नजरिया बेहद अलग और रूह कंपा देने वाला है। जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें मौत से डर लगता है, तो उन्होंने कहा, “कतई नहीं।” लेकिन उन्हें एक ही डर है—अपनी मां को खोने का।

संजय ने बताया कि जब उनके पिता का देहांत हुआ, तो उनकी दादी ने खुद को कमरे में बंद कर लिया था क्योंकि वो अपने बेटे की मौत बर्दाश्त नहीं कर पा रही थीं। संजय कहते हैं, **”मेरी बस एक ही ख्वाहिश है कि माता जी के पहले मैं ना निकलूं… वो बहुत रोती हैं।”** वो अपनी मां को वो दुख नहीं देना चाहते जो उनकी दादी ने सहा था।

करोड़पति एक्टर, जो आज भी चुराता है ‘नींबू’ और ‘गाजर’

संजय मिश्रा बॉलीवुड के सफल अभिनेताओं में से एक हैं, लेकिन उनका दिल आज भी ‘फक्कड़’ है। उन्होंने हंसते हुए कबूला कि वो आज भी सब्जी मंडी में जाकर मोलभाव करते हैं और मौका मिलने पर **दो-तीन नींबू या गाजर चुराने से बाज नहीं आते**।

संजय कहते हैं, “यह है सफलता। वो सब्जी वाला भी कहेगा कि साला इतना बड़ा एक्टर है… लेकिन वो जो सुख है ना गाजर चोरी करने का, वो अलग है”,। उन्हें बड़े होटलों में रहने का शौक नहीं है; वो आउटडोर शूट पर भी खुद स्टोव पर खाना बनाते हैं और वैनिटी वैन में सरसों का साग और मक्के की रोटी पसंद करते हैं,।

जब शमशान की ‘राख’ लपेटकर पहुंचे ससुराल

संजय मिश्रा की जिंदगी किसी फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं है। अपनी शादी का एक बेहद दिलचस्प और अजीब किस्सा शेयर करते हुए उन्होंने बताया कि वो अपनी शादी के बाद पहली बार जब अपने ससुर (Father-in-law) से मिले, तो वो **शमशान घाट की राख में लिपटे हुए थे**।

हुआ यूं कि संजय अपने पिता की अस्थियां विसर्जित करने या उनसे जुड़ी किसी रस्म के लिए शमशान (निगम बोध घाट) गए थे। वहां से लौटने के बाद वो नहाए नहीं और राख में सने हुए ही घर आ गए, जहां उनके ससुर उनका इंतजार कर रहे थे। उनके ससुर ने जब दरवाजा खोला तो देखा कि दामाद जी राख में लिपटे खड़े हैं। यह दृश्य देखकर उनके ससुर हैरान रह गए थे।

“मैं खुद बनारस हूं”

संजय मिश्रा सिर्फ एक एक्टर नहीं, बल्कि एक चलता-फिरता ‘इंस्टीट्यूशन’ हैं। बनारस से क्या सीखा? इस सवाल पर वो कहते हैं, “मैं खुद बनारस हूं, जीता जागता शहर। दूसरे शहर मृत्यु को लेकर शोक मनाते हैं, बनारस उत्सव मनाता है”

चाहे 28-30 गर्लफ्रेंड्स के किस्से हों या 25 पैसे (चवन्नी) वाली खुशी, संजय मिश्रा ने साबित कर दिया है कि असली हीरो वो नहीं जो 10 गुंडों को मारे, बल्कि वो है जो त्रासदियों को हंसी में घोलकर पी जाए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *