दबंगई, गैंगवॉर, मंडल की राजनीति और अजीत सरकार हत्याकांड से लेकर लॉरेंस बिश्नोई से पंगे तक—राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव की पूरी कहानी।
बिहार की राजनीति में कुछ नाम ऐसे हैं जो सत्ता के गलियारों से ज्यादा विवादों और जरायम की दुनिया की खबरों में तैरते रहे हैं। इन्हीं नामों में सबसे ऊपर आता है—राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव। एक ऐसा शख्स जिसके लिए कानून कभी खिलौना बना, तो कभी वही कानून उसे सलाखों के पीछे ले गया। कोसी और सीमांचल के इलाके में ‘मसीहा’ की छवि और पुलिस की फाइलों में ‘बाहुबली’ का तमगा, पप्पू यादव का जीवन किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है।
शुरुआत: जमींदार परिवार से अपराधी बनने तक का सफर
पप्पू यादव की कहानी 24 दिसंबर 1967 को बिहार के मधेपुरा में शुरू होती है। उनके दादा लक्ष्मी मंडल इलाके के बड़े जमींदार और सरपंच थे, जिनके पास सैकड़ों एकड़ जमीन और रसूख के नाम पर हाथी-घोड़े थे। राजेश रंजन को उनके दादा प्यार से ‘पप्पू’ बुलाते थे और यही नाम आगे चलकर बिहार की राजनीति का एक बड़ा ब्रांड बन गया।
पप्पू यादव का बचपन अभावों में नहीं, बल्कि विलासिता में बीता। वे उस दौर में फिएट या एंबेसडर कार से स्कूल जाते थे जब गांव में साइकिल होना भी बड़ी बात थी। लेकिन पढ़ाई से ज्यादा उनका मन कॉलेज की लड़ाई-झगड़ों में लगता था। सातवीं कक्षा से ही उन्होंने शराब पीना शुरू कर दिया था और कॉलेज तक आते-आते वे हथियारों के शौकीन हो गए। हालात यहाँ तक पहुँच गए कि उन्होंने अपनी माँ के जेवर बेचकर एक बंदूक खरीद ली थी।
कॉलेज के दौरान एक झगड़े के मामले में वे पहली बार जेल गए, जहाँ उनकी मुलाकात अपने रिश्तेदार और लोकल हिस्ट्रीशीटर अर्जुन यादव से हुई। अर्जुन यादव पूर्णिया में एक समानांतर सरकार चलाता था। जेल से बाहर आते ही पप्पू यादव, अर्जुन यादव के गैंग का हिस्सा बन गए। जब अर्जुन यादव की हत्या हुई, तो गैंग की पूरी कमान पप्पू यादव के हाथों में आ गई और यहीं से शुरू हुआ अपराध और वर्चस्व का वो दौर जिसने कोसी इलाके को दहला दिया।
1990 का चुनाव: राजनीति में ‘अवैध’ एंट्री और मंडल आयोग का असर
पप्पू यादव का दबदबा अब मधेपुरा और आसपास के इलाकों में बढ़ चुका था। 1990 के बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने जनता दल से टिकट माँगा, लेकिन जब पार्टी ने इनकार कर दिया, तो उन्होंने निर्दलीय ही मधेपुरा की सिंघेश्वर सीट से पर्चा भर दिया। उस समय पप्पू की उम्र मात्र 23 साल थी, जबकि चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु 25 साल होनी चाहिए थी। एक गलत हलफनामा देकर वे मैदान में उतरे और भारी मतों से जीतकर विधायक बन गए।
यही वो समय था जब केंद्र की वीपी सिंह सरकार ने मंडल आयोग लागू किया। बिहार की राजनीति ‘अगड़ा बनाम पिछड़ा’ की आग में झुलसने लगी। जब मुख्यमंत्री लालू यादव ने पटना में वीपी सिंह की रैली का आह्वान किया, तो ऊंची जातियों ने ‘जनता कर्फ्यू’ लगा दिया। पप्पू यादव अपने समर्थकों के साथ मधेपुरा से बसों का काफिला लेकर निकले। बेगूसराय और मोकामा के भूमिहार बाहुल्य क्षेत्रों में उनकी भिड़ंत स्थानीय लोगों से हुई। सियनार गांव के पास जमकर गोलीबारी हुई और पप्पू यादव को अपनी जान बचाने के लिए एक थाने में शरण लेनी पड़ी।
इस घटना ने पप्पू यादव को ‘पिछड़ों का नायक’ बना दिया। मधेपुरा लौटकर उनके समर्थकों ने अगड़ी जातियों पर हमले किए, जिससे उनकी छवि एक ऐसे नेता की बनी जो अपर कास्ट से आंख में आंख मिलाकर बात कर सकता था।
आनंद मोहन सिंह के साथ वर्चस्व की जंग: जब कोसी बना कुरुक्षेत्र
मंडल आयोग के बाद बिहार दो गुटों में बंट गया था। एक तरफ पिछड़ों के नेता के रूप में पप्पू यादव उभर रहे थे, तो दूसरी तरफ राजपूतों और अगड़ी जातियों के नेता के रूप में आनंद मोहन सिंह सामने आए। आनंद मोहन भी एक बाहुबली छवि के नेता थे। इन दोनों बाहुबलियों की आपसी रंजिश ने कोसी और सीमांचल इलाके में गृह युद्ध (Civil War) जैसी स्थिति पैदा कर दी।
आरोप हैं कि इन दोनों गैंग्स के बीच हुई लड़ाई में 100 से ज्यादा लोगों की जान गई। राजनीति अब हथियारों के साये में खेली जा रही थी। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई थी कि पप्पू यादव के काफिले में 40-50 गाड़ियाँ और हथियारबंद लोग चलते थे, जिन्हें रोकने की हिम्मत पुलिस प्रशासन भी नहीं जुटा पाता था।
चुनाव आयोग बनाम पप्पू यादव: टीएन सेशन का सख्त रुख
1991 के लोकसभा चुनाव में पप्पू यादव पूर्णिया सीट से निर्दलीय चुनाव लड़े। वोटिंग के दिन बड़े पैमाने पर धांधली और बूथ लूटने की शिकायतें आईं। विपक्षी उम्मीदवारों का आरोप था कि पप्पू के लोगों ने करीब 300 बूथ लूट लिए हैं। जब यह खबर तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन सेशन तक पहुँची, तो उन्होंने तत्काल पूर्णिया का चुनाव रद्द कर दिया। यह भारतीय चुनावी इतिहास की एक बड़ी घटना थी।
उसी दौरान मधेपुरा उपचुनाव में एक और दिलचस्प मोड़ आया। जनता दल के दिग्गज नेता शरद यादव वहां से चुनाव लड़ रहे थे। लालू यादव नहीं चाहते थे कि शरद यादव (जो कद में उनसे बड़े थे) बिहार में पैर पसारें, इसलिए उन्होंने पप्पू यादव को झारखंड भेज दिया। लेकिन पप्पू वापस लौट आए और शरद यादव का प्रचार किया। इस चुनाव के दौरान हिंसा अपने चरम पर थी। पप्पू यादव का दावा है कि उनके ऊपर करीब 10,000 राउंड गोलियां चलाई गईं और 8 घंटे तक मुठभेड़ चली, जिसमें उनके ड्राइवर समेत तीन लोग मारे गए。 अंततः शरद यादव जीत गए, लेकिन इस जीत ने पप्पू यादव को ‘किंगमेकर’ और पिछड़ों का बड़ा चेहरा बना दिया।
लव स्टोरी: जेल से टेनिस कोर्ट तक का सफर
पप्पू यादव की जिंदगी में सिर्फ अपराध और राजनीति ही नहीं, बल्कि एक फिल्मी प्रेम कहानी भी है। 1991 में जब वे पटना जेल में बंद थे, तो उन्होंने एक लड़के ‘विक्की’ की एल्बम में उसकी बहन रंजीत रंजन की फोटो देखी, जो टेनिस खिलाड़ी थीं। पप्पू को पहली नजर में ही प्यार हो गया। जेल से बाहर आते ही वे रंजीत का पीछा करने लगे, यहाँ तक कि वे उनके पीछे पंजाब की यूनिवर्सिटी तक पहुँच गए।
रंजीत एक सिख परिवार से थीं और उनका परिवार एक ‘बिहारी यादव बाहुबली’ से शादी के सख्त खिलाफ था। रंजीत ने भी शुरुआत में पप्पू को मना कर दिया। निराश होकर पप्पू यादव ने नींद की गोलियां खाकर आत्महत्या की कोशिश की और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। आखिरकार, कांग्रेस नेता एसएस अहलवालिया की मध्यस्थता के बाद 1994 में दोनों की शादी हुई।
अजीत सरकार हत्याकांड: वो दाग जो कभी नहीं धुला
पप्पू यादव के करियर का सबसे काला अध्याय अजीत सरकार हत्याकांड है। अजीत सरकार पूर्णिया से माकपा (CPI-M) के विधायक थे और अपनी सादगी व ईमानदारी के लिए जाने जाते थे। वे इतने लोकप्रिय थे कि चुनाव लड़ने के लिए लोगों से एक-एक रुपये का चंदा मांगते थे। 1995 के चुनाव में अजीत सरकार ने पप्पू यादव को हरा दिया था, जो पप्पू के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया था।
14 जून 1998 को पूर्णिया के सुभाष नगर में अजीत सरकार की गाड़ी पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई गईं। उन्हें 107 गोलियां मारी गईं, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। सीबीआई जांच में पप्पू यादव को मुख्य साजिशकर्ता बताया गया। साल 2008 में स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने पप्पू यादव को उम्रकैद की सजा सुनाई, जिसे सुनकर वे अदालत में ही रो पड़े थे। हालांकि, 2013 में पटना हाईकोर्ट ने सबूतों के अभाव में उन्हें बरी कर दिया, लेकिन सीबीआई की अपील आज भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है。
संसद और जेल के बीच का लुका-छिपी का खेल
पप्पू यादव की ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वे जेल में रहते हुए भी चुनाव जीत जाते थे। 1999 और 2004 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने जेल से ही पर्चा भरा और सांसद बने। जेल में रहते हुए उन्होंने ‘पार्टियां’ दीं, फोन का इस्तेमाल किया और अपना पूरा साम्राज्य चलाया। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पटना की बेउर जेल से दिल्ली की तिहाड़ जेल शिफ्ट करने का आदेश दिया था।
महत्वपूर्ण तथ्य और आंकड़े
- जन्म: 24 दिसंबर 1967, मधेपुरा।
- शिक्षा: जेल में रहते हुए ही 12वीं की परीक्षा दी।
- पहली जीत: 1990 में 23 साल की उम्र में निर्दलीय विधायक बने।
- रिकॉर्ड: पति-पत्नी (पप्पू और रंजीत रंजन) 2014 में अलग-अलग पार्टियों से सांसद बनकर एक साथ संसद पहुँचे।
- पुरस्कार: 2015 में ‘सर्वश्रेष्ठ सांसद’ का खिताब मिला।
- पार्टी: 2015 में अपनी पार्टी ‘जन अधिकार पार्टी’ (JAP) बनाई, जिसका बाद में कांग्रेस में विलय कर दिया।
बदलाव की कोशिश: समाज सेवा और नए विवाद
2013 में बरी होने के बाद पप्पू यादव ने अपनी छवि बदलने की कोशिश की। बाढ़ हो या कोरोना काल, वे लोगों की मदद के लिए सबसे आगे खड़े नजर आए। उन्होंने अपने पुराने दुश्मन आनंद मोहन से भी सुलह कर ली।
लेकिन 2024 में लॉरेंस बिश्नोई गैंग के साथ उनका नया विवाद शुरू हुआ। मुंबई में बाबा सिद्दीकी की हत्या के बाद पप्पू ने ट्वीट किया कि वे 24 घंटे में लॉरेंस बिश्नोई के नेटवर्क को खत्म कर सकते हैं। इसके बाद उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं। घबराकर पप्पू यादव ने गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर सुरक्षा मांगी और अपने बयान को ‘राजनीतिक बयानबाजी’ बताकर पल्ला झाड़ लिया। यहाँ तक कि उनकी पत्नी रंजीत रंजन ने भी उनके बयानों से खुद को अलग कर लिया।
विश्लेषण और प्रभाव
पप्पू यादव की राजनीति बिहार के उस ‘दबंगई युग’ का प्रतीक है जहाँ बाहुबल ही सत्ता की कुंजी थी। उनके उत्थान में ‘मंडल राजनीति’ का बड़ा हाथ रहा, जिसने उन्हें पिछड़ों के रक्षक के तौर पर पेश किया। हालांकि, उनके ऊपर लगे आपराधिक आरोप और अजीत सरकार जैसे ईमानदार नेता की हत्या का साया उनकी उपलब्धियों को हमेशा धुंधला करता रहेगा। समाज सेवा के जरिए उन्होंने अपनी छवि को सुधारने का प्रयास जरूर किया है, लेकिन लॉरेंस बिश्नोई जैसे मामलों में उनकी बयानबाजी दिखाती है कि वे आज भी सुर्खियों में रहने के लिए पुराने ‘बाहुबली’ अंदाज का मोह नहीं छोड़ पाए हैं।
निष्कर्ष
पप्पू यादव का सफर जमींदारी से जरायम और फिर जरायम से जनसेवा तक का एक लंबा चक्र है। आज वे पूर्णिया से निर्दलीय सांसद हैं और कांग्रेस के साथ खड़े हैं। उन्होंने जेल की कालकोठरी भी देखी है और संसद की आलीशान कुर्सियां भी। लेकिन सवाल आज भी वही है—क्या राजनीति में आने के बाद अपराध के दाग सच में धुल जाते हैं? अजीत सरकार के हत्यारे अगर आज भी कानून की पकड़ से दूर हैं, तो न्याय कहाँ है? पप्पू यादव की कहानी बिहार की राजनीति के उस स्याह सच को उजागर करती है, जहाँ नायक और खलनायक के बीच की रेखा बहुत धुंधली होती है।
















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