भारत का न्यायिक तंत्र कई प्रकार की जूरिस्डिक्शन अर्थात न्यायालय की अधिकार सीमाओं पर आधारित है। हर कोर्ट हर प्रकार के केस की सुनवाई नहीं कर सकता। कोर्ट का अधिकार इस बात पर निर्भर करता है कि केस कहां हुआ, किस विषय का है, और कितने मूल्य का है। चलिए इस लेख में जानें भारत में जूरिस्डिक्शन के प्रकार और उनकी अहमियत।
जरा सोचिए, अगर आपके घर चोरी हो या ऑनलाइन फ्रॉड का शिकार हो जाएं, तो क्या आप किसी एक कोर्ट में इन सभी मामलों को ले जा सकते हैं? इसका जवाब समझने के लिए हमें जूरिस्डिक्शन की धारणा को समझना होगा।
जूरिस्डिक्शन क्या है?
जूरिस्डिक्शन का अर्थ है किसी खास कोर्ट का कानूनी अधिकार कि वह किसी केस को सुने और उस पर फैसला दे। यह कई कारकों पर निर्भर करता है। उदाहरण के तौर पर, अपराध कहां हुआ, उसका विषय क्या है, और केस की आर्थिक कीमत कितनी है।
आइए हर प्रकार के जूरिस्डिक्शन को विस्तार से समझें।
टेरिटोरियल जूरिस्डिक्शन (क्षेत्रीय अधिकार)
अपराध की जगह पर निर्भर न्याय
टेरिटोरियल जूरिस्डिक्शन का मतलब है किसी कोर्ट का अधिकार क्षेत्र उस क्षेत्र पर आधारित होता है जहां अपराध हुआ या जहां इसका असर महसूस किया गया।
उदाहरण:
- फैमिली विवाद: अगर कोई तलाक या चाइल्ड कस्टडी का मुद्दा है, तो वह उसी जगह के कोर्ट में जाएगा जहां शादी संपन्न हुई थी या जहां पार्टियां रहती हैं।
- प्रॉपर्टी विवाद: मुंबई की प्रॉपर्टी का विवाद दिल्ली में नहीं उठाया जा सकता।
- क्रिमिनल केस: निर्भया केस दिल्ली में हुआ, इसलिए उसका ट्रायल दिल्ली की कोर्ट में शुरू हुआ।
- साइबर क्राइम: चेन्नई का व्यक्ति बैंगलोर स्थित बैंक के सर्वर को हैक करने की कोशिश करता है। अब इसमें कोर्ट यह देखेगा कि अपराध कहां हुआ और इसका असर कहां महसूस किया गया।
इस प्रकार टेरिटोरियल जूरिस्डिक्शन अपराध की भौगोलिक स्थिति के आधार पर तय होता है।
सब्जेक्ट मैटर जूरिस्डिक्शन
केस के विषय पर आधारित अधिकार
हर कोर्ट का अधिकार उसके विषय पर निर्भर करता है। आसान शब्दों में, कौन सा कोर्ट किस प्रकार के केस सुन सकता है, यह उसके विषय के आधार पर तय होता है।
उदाहरण:
- सिविल कोर्ट्स: प्रॉपर्टी विवाद, कांट्रैक्ट का उल्लंघन, लैंडलॉर्ड और टेनेंट के मुद्दे।
- क्रिमिनल कोर्ट्स: सभी छोटे और बड़े अपराध जैसे चोरी, धोखाधड़ी या हत्या।
- फैमिली कोर्ट: तलाक, बच्चों की अभिरक्षा, शादी से जुड़े विवाद।
- एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल: सरकारी कर्मचारियों से जुड़े मामले, जैसे पेंशन या सर्विस विवाद।
हर कोर्ट का अधिकार अलग है। एक सिविल कोर्ट क्रिमिनल केस नहीं सुन सकता, और क्रिमिनल कोर्ट शादी के विवाद में दखल नहीं दे सकता।
ओरिजिनल जूरिस्डिक्शन
केस की पहली सुनवाई का अधिकार
जब कोई कोर्ट किसी केस को पहली बार सुनता है, तो उसे ओरिजिनल जूरिस्डिक्शन कहा जाता है। उदाहरण के लिए, कुछ खास मामले सीधे सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में शुरू होते हैं।
उदाहरण:
- सुप्रीम कोर्ट:
- दो राज्यों के बीच विवाद।
- राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति के चुनाव से जुड़े मामले।
- मौलिक अधिकारों का उल्लंघन (आर्टिकल 32)।
- हाई कोर्ट:
- किसी भी राज्य के मुद्दे।
- मौलिक अधिकारों का उल्लंघन (आर्टिकल 226)।
यह जरूरी नहीं कि हर केस लोअर कोर्ट से होते हुए ही हाई या सुप्रीम कोर्ट में पहुंचे। कई केस सीधे उनसे शुरू हो सकते हैं।
अपीलेट जूरिस्डिक्शन
फैसले को चुनौती देने का अधिकार
जब आप किसी कोर्ट के दिए फैसले से संतुष्ट नहीं होते, तो आप उसे उच्च अदालत में चुनौती दे सकते हैं। इसे अपीलेट जूरिस्डिक्शन कहते हैं।
उदाहरण:
- अगर मर्डर केस में सेशंस कोर्ट ने फैसला सुनाया, तो आप इसे हाई कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं।
- राजीव गांधी हत्या केस इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
आप सुप्रीम कोर्ट के फैसले से असंतुष्ट हैं, तो रिव्यू पिटीशन या क्यूरेटिव पिटीशन फाइल कर सकते हैं। हालांकि ये विकल्प दुर्लभ मामलों में ही सफल होते हैं।
पेक्यूनियरी जूरिस्डिक्शन
मामले की आर्थिक राशि पर आधारित अधिकार
कोर्ट का निर्णय इस बात पर निर्भर करता है कि केस की असल आर्थिक कीमत कितनी है। छोटे अमाउंट वाले केस छोटे कोर्ट में और बड़े अमाउंट वाले केस बड़े कोर्ट में जाते हैं।
उदाहरण:
- स्मॉल कॉसेस कोर्ट: शॉप के बकाया किराए या मामूली प्रॉपर्टी डैमेज।
- डिस्ट्रिक्ट कोर्ट: कांट्रैक्ट उल्लंघन जिसमें बड़ी राशि शामिल हो।
- सुप्रीम कोर्ट: इसमें राशि की कोई सीमा नहीं है।
हर राज्य के अपने अलग नियम हैं, जैसे कुछ कोर्ट 10 लाख तक के केस देखती हैं और कुछ 50 लाख तक।
एडवाइजरी जूरिस्डिक्शन
कानूनी मार्गदर्शन का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट में ऐसा भी अधिकार है जहां वह राष्ट्रपति के अनुरोध पर किसी महत्वपूर्ण कानूनी या संवैधानिक विषय पर अपनी राय देता है।
उदाहरण:
- संविधान की व्याख्या।
- राष्ट्रीय नीति, प्रशासन या अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दे।
ध्यान रखें कि सुप्रीम कोर्ट की राय बाइंडिंग नहीं होती। राष्ट्रपति चाहे तो इस पर अमल कर सकते हैं या इसे नजरअंदाज कर सकते हैं।
निष्कर्ष
जूरिस्डिक्शन भारत के न्यायिक तंत्र का आधार है। यह तय करता है कि कौन सा कोर्ट किस प्रकार के केस की सुनवाई करेगा। चाहे टेरिटोरियल हो, सब्जेक्ट मैटर हो या पेक्यूनियरी, हर प्रकार की जूरिस्डिक्शन का अपना महत्व है।
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